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पुलिस के लिए सख्त चेतावनी: मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और समाज को संदेश

 पुलिस के लिए सख्त चेतावनी: मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और समाज को संदेश

लेखक: अधिवक्ता राजेश कुमार

नेशनल हेड एवं लीगल एडवाइजर

मद्रास हाईकोर्ट ने सोमवार को न्याय की उस मिसाल को कायम किया, जिसकी पूरे देश को बेसब्री से प्रतीक्षा थी। 2020 के तमिलनाडु के साथानकुलम कस्टोडियल डेथ मामले में 59 वर्षीय व्यापारी पी. जयराज और उनके 31 वर्षीय बेटे जे. बेनिक्स की पुलिस हिरासत में हुई निर्मम हत्या के लिए नौ पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा सुनाई गई। न्यायमूर्ति जी. मुथुकुमारन ने इसे “रेयरेस्ट ऑफ द रेयर” मामला करार देते हुए साफ कहा कि यह अपराध सत्ता के दुरुपयोग और अमानवीय क्रूरता का जीता-जागता उदाहरण है।

CBI की जांच ने साबित किया कि यह कोई अचानक हुई घटना नहीं थी। पुलिस ने जानबूझकर, पूरी रात दोनों पिता-पुत्र को इतनी बेरहमी से पीटा कि उनकी मौत हो गई। यह सोची-समझी साजिश थी। पद का दुरुपयोग कर जानबूझकर घातक चोटें पहुंचाई गईं। अदालत ने इस तथ्य को स्वीकार करते हुए स्पष्ट संदेश दिया — कानून का रक्षक अगर कानून का हत्यारा बन जाए, तो उसे कोई बच नहीं सकता।

यह फैसला सिर्फ नौ पुलिसकर्मियों की सजा नहीं है। यह पूरी पुलिस व्यवस्था के लिए एक लाउड एंड क्लियर चेतावनी है।

पुलिस भाई-बहनों के लिए खास संदेश:

आपका यूनिफॉर्म सम्मान का प्रतीक है, न कि लाइसेंस टू किल।

आपका लाठी-डंडा अपराधियों के खिलाफ है, निर्दोष नागरिकों के खिलाफ नहीं।

हिरासत मतलब सुरक्षा, मतलब यातना नहीं।

अगर आप सत्ता के नशे में यह भूल जाते हैं कि आप भी कानून के अधीन हैं, तो मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला आपको याद दिलाएगा — फांसी का फंदा किसी की भी गर्दन पर लग सकता है।

यह फैसला भविष्य के हर उस पुलिसकर्मी के लिए आईना है जो सोचता है कि “कस्टडी में थोड़ी मार-पीट से क्या होता है”। अब पता चल गया है — होता है। बहुत कुछ होता है। पूरा देश देख रहा है। CBI देख रही है। हाईकोर्ट देख रहा है। और सबसे ऊपर संविधान देख रहा है।

समाज को संदेश:

आज हम सबके लिए गर्व का क्षण है।

जब न्यायपालिका इतनी मजबूती से खड़ी होती है, तो आम आदमी को विश्वास होता है कि कानून अभी भी जीवित है।

यह फैसला उन हजारों परिवारों को न्याय दिलाने का रास्ता दिखाता है, जिनके घर में कभी पुलिस की क्रूरता ने चिराग बुझा दिए थे।

लेकिन यह फैसला सिर्फ जश्न मनाने के लिए नहीं है। यह पुलिस सुधार की मांग का भी प्रतीक है।

पुलिस की ट्रेनिंग में मानवाधिकार और संवेदनशीलता को अनिवार्य बनाना चाहिए।

कस्टोडियल डेथ की हर घटना पर स्वतंत्र CBI जांच अनिवार्य होनी चाहिए।

पुलिसकर्मियों को यह समझना होगा कि उनका सबसे बड़ा दुश्मन “अपनी ही क्रूरता” है, जो पूरे बल की छवि को कलंकित करती है।

हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 में हर नागरिक को “जीने का अधिकार” दिया गया है। पुलिस हिरासत में मौत इसका सबसे घिनौना उल्लंघन है। मद्रास हाईकोर्ट ने आज इस उल्लंघन को “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” मानते हुए फांसी की सजा देकर साबित कर दिया कि कानून के सामने कोई भी छोटा या बड़ा नहीं।

अंत में

यह फैसला इतिहास में दर्ज हो चुका है।

अब सवाल यह है — हम इस फैसले को सिर्फ अखबार की सुर्खी बनाकर छोड़ देंगे या इसे पुलिस कल्चर में बदलाव का हथियार बनाएंगे?

, पूरे समाज से अपील करता हूं —

इस फैसले को सिर्फ जयकार नहीं, जागृति का माध्यम बनाइए।

हर पुलिस स्टेशन में, हर थाने की दीवार पर यह संदेश अंकित हो कि “कस्टोडियल टॉर्चर = फांसी”।

कानून का राज अभी भी कायम है।

और अब यह राज और मजबूत

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