भारत में लोकतंत्र की गिरावट: एक चिंताजनक वास्तविकता
नेशनल ब्यूरो हेड एवं लीगल एडवाइजर अधिवक्ता राजेश कुमार की कलम से
केवल TTN 24 National News Channel के लिए
(यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है और जरूरी नहीं कि यह सभी की राय का प्रतिनिधित्व करे।)
20 फरवरी, 2026: आज का भारत, जहां लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर पड़ती जा रही है, एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां सत्ता की होड़ में नैतिकता और संवैधानिक मूल्यों का ह्रास स्पष्ट दिखाई देता है। देश में प्रजातंत्र की जगह तंत्र हावी हो गया है, जहां जनता के दुख-दर्द से नेताओं का कोई वास्ता नहीं रह गया। मीडिया बिक चुकी है, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं, और आम आदमी अपनी आवाज उठाने से डरता है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर आरोप लग रहे हैं, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। यह सब एक ऐसे राष्ट्र के लिए शर्मनाक है जिसने गांधी, नेहरू, बोस और झांसी की रानी जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत को संजोया है।आज की राजनीति में नीचे गिरने की होड़ लगी है। जो जितना नीचे गिरे, वही बड़ा नेता बनता है। विपक्षी नेताओं पर सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग आम बात हो गई है। हाल के महीनों में, विपक्षी दलों के नेताओं पर राज्य विरोधी मामले दर्ज किए गए हैं, जो सत्ता के दुरुपयोग का स्पष्ट उदाहरण है। फ्रीडम हाउस की 2025 रिपोर्ट में भारत को "पार्टली फ्री" देश के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जहां राजनीतिक अधिकार और नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित हैं।वी-डेम रिपोर्ट के अनुसार, भारत "सबसे खराब ऑटोक्रेटाइजरों" में से एक है, जहां लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण हो रहा है।
मीडिया, जो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, पूरी तरह बिक चुकी है। पत्रकारों पर हमले बढ़ रहे हैं, और सरकारी दबाव में समाचार चैनल और अखबार सत्ता की भाषा बोलने लगे हैं। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की 2025 रिपोर्ट में भारत प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 161वें स्थान पर है, जो पाकिस्तान और श्रीलंका से भी नीचे है। अडानी ग्रुप द्वारा पत्रकारों पर मुकदमे दायर करना और नई डेटा कानूनों का इस्तेमाल प्रेस की स्वतंत्रता को दबाने के लिए किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर भी सेंसरशिप बढ़ रही है, जहां तीन घंटे में "गैरकानूनी" कंटेंट हटाने का नियम लागू किया गया है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी खतरे में है। अदालतों में मुकदमों का ढेर लगा है—जनवरी 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में 90,000 से अधिक केस लंबित हैं।इंटरनेशनल कमीशन ऑफ जूरिस्ट्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायिक शासन में संरचनात्मक कमियां और राजनीतिक हस्तक्षेप न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर कर रहे हैं। न्यायाधीशों के ट्रांसफर पर कार्यकारी प्रभाव और विविधता की कमी न्याय व्यवस्था को कमजोर कर रही है। लोग न्याय की उम्मीद में सालों इंतजार करते हैं, लेकिन न्याय अब "बिक चुका" लगता है, सरकारी कठपुतली बनकर रह गया है।
जनता में डर का माहौल है। सोशल मीडिया के जमाने में भी लोग सरकार के खिलाफ बोलने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। सर्विलांस स्टेट का विस्तार और हेट स्पीच का सामान्यीकरण लोगों की आवाज दबा रहा है।faf462 शिक्षाविदों, पत्रकारों और सामान्य नागरिकों में डर व्याप्त है कि उनकी बातें रिकॉर्ड की जा रही हैं या उन्हें निशाना बनाया जाएगा
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया में विपक्षी दलों के आरोप हैं कि विपक्षी मतदाताओं, खासकर अल्पसंख्यकों और PDA समुदायों के नाम हटाए जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे "तुगलकी" कहा है, जबकि उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने अनियमितताओं का आरोप लगाया है निष्पक्ष चुनाव अब सपना लगते हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत को बार-बार नीचा दिखाया है, लेकिन भारतीय सरकार मौन है। हालिया ट्रेड डील के बावजूद, ट्रंप ने भारत को "मृत अर्थव्यवस्था" कहा और टैरिफ लगाए भारत की सरकारी चुप्पी से लगता है कि हमारी विदेश नीति कमजोर हो गई है।
संसद अब अखाड़ा बन चुकी है, जहां झूठ और सच की होड़ लगी है। पेगासस जैसे स्पाईवेयर का इस्तेमाल प्रभावशाली लोगों पर किया जा रहा है, लेकिन मीडिया चुप है। क्या हमारा संविधान इतना कमजोर हो चुका है? क्या आने वाली पीढ़ियां हमें एक असफल लोकतंत्र के रूप में याद रखेंगी?
यह समय जागने का है। जनता को अपनी आत्मा जगानी होगी, आवाज उठानी होगी। लोकतंत्र तभी बचेगा जब हम सब मिलकर इसके लिए लड़ेंगे। अन्यथा, हम मर-मर के जीने को मजबूर रहेंगे।
