रिपोर्ट भरतसिंह आर ठाकोर अरवल्ली गुजरात
तपती गर्मी की भूमि पर प्राकृतिक कृषि का हरा-भरा सपना
पानी की कमी के बावजूद, प्राकृतिक कृषि ग्रीष्मकालीन रोपण में सफल रहे
रसायन मुक्त खेती से गर्मियों में भी भरपूर फसल प्राप्त करें
जब गर्मियों का सूरज पृथ्वी को गर्म करता है और पानी की हर बूंद कीमती हो जाती है, तो जैविक कृषि किसानों के लिए आशा और सामंजस्य लाती है। आज जैविक खेती रसायनों से क्षीण हो चुकी मिट्टी को पुनर्जीवित करने का कार्य सफलतापूर्वक कर रही है।ग्रीष्मकालीन रोपण में तुवर, मूंग, उड़द, तिल और दूधी, तुरिया, खीरा, भिंडी जैसी सब्जियों की फसलें प्राकृतिक विधि से कम सिंचाई में भी उत्कृष्ट उत्पादन दे रही हैं। जीवामृत, घनजीवामृत और मल्चिंग जैसी विधियां मिट्टी में नमी बनाए रखती हैं और फसल को प्राकृतिक पोषक तत्व प्रदान करती हैं।
जैविक कृषि केवल एक कृषि पद्धति नहीं है, बल्कि पृथ्वी के साथ सहजीवन है। देशी गाय आधारित सामग्रियों से खेती करने से किसान की लागत कम होती है, मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और समाज को जहरीले रसायनों से मुक्त भोजन मिलता है।
आज जब जलवायु परिवर्तन और जल संकट बड़ी चुनौतियां हैं, तो ग्रीष्मकालीन खेती में जैविक कृषि को अपनाना समय की मांग बन गई है। इस विधि से किसान आत्मनिर्भर बनता है और भावी पीढ़ियों के लिए स्वस्थ मिट्टी सुरक्षित रखता है।
किसानों से अपील है कि वे जैविक कृषि अपनाकर गर्मी की धरती पर हरा-भरा भविष्य बनाने के इस अनूठे अवसर का लाभ उठाएं।
