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बारडोली गुजरात: बारडोली में सौभाग्यवती महिलाओं ने अपने पति की लंबी उम्र और खुशी की प्रार्थना करके वट सावित्री का त्योहार मनाया

 TTN 24न्यूज 

ब्यूरोचीफ,शैलेन्द्रसिंह बारडोली गुजरात 


बारडोली में सौभाग्यवती महिलाओं ने अपने पति की लंबी उम्र और खुशी की प्रार्थना करके वट सावित्री का त्योहार मनाया।

बारडोली शहर और उसके आस-पास के इलाकों में धन्य महिलाओं ने श्रद्धा के साथ वट सावित्री का व्रत मनाया। इस दिन, धन्य महिलाओं ने अपने पति की लंबी उम्र और खुशी की कामनाए की।


बारडोली शहर के गोविंदा आश्रम, रामजी मंदिर, तेनगांव साईं मंदिर, बालादेवी सोसाइटी और दूसरे मंदिरों के परिसर में, धन्य महिलाओं ने बरगद के पेड़ों की पूजा भूदेवो के मंत्रोच्चार के साथ आस्था और उत्साह के साथ वट सावित्री का व्रत मनाया।


भारतीय संस्कृति में व्रत और पर्व मात्र धार्मिक अनुष्ठान नही हैं, बल्कि वे जीवन- दर्शन, सामाजिक मर्यादाओं, प्रकृति संरक्षण और आध्यात्मिक चेतना के सजीव संवाहक हैं। 

भारतीय परंपरा में निहित प्रत्येक व्रत मानव जीवन को नैतिकता, संयम, प्रेम और कर्तव्य बोध से जोड़ने का कार्य करता है। विशेष रूप से भारतीय नारी-जीवन मे ऐसा अनेक व्रत विद्यमान हैं, जो परिवार, दांपत्य और समाज के मध्य भावनात्मक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक संबंधों को सुदृढ बनाते हैं। इन्हीं पावन परंपराओं में “वट सावित्री व्रत " का विशिष्ट और अत्यंत गौरवपूर्ण स्थान है। यह व्रत भारतीय नारी के अटूट संकल्प, अखंड प्रेम, तपस्या, धैर्य और त्याग का अनुपम प्रतीक माना जाता है।



ज्येष्ठ मास की अमावस्या अथवा पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल पति की दीर्घायु की कामना तक सीमित नही है, बल्कि यह जीवन और मृत्यु, धर्म और नियति, प्रेम और तपस्या के मध्य भारतीय चिंतन की गहन दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। 


वट वृक्ष की पूजा, सावित्री और सत्यवान की अमर कथा तथा यमराज के साथ सावित्री का संवाद भारतीय सांस्कृतिक चेतना में स्त्री की अद्भुत बुद्धिमत्ता, आध्यात्मिक शक्ति और अडिग आत्मविश्वास को प्रतिष्ठित करता है। सावित्री केवल एक आदर्श पत्नी का प्रतीक नहीं, बल्कि सत्य, साहस और संकल्प की उस ज्योति का नाम है, जो मृत्यु जैसे अपरिहार्य सत्य को भी अपने तप और विवेक से पराजित कर देती है।

वट वृक्ष स्वयं भारतीय संस्कृति मे दीर्घायु, स्थिरता और जीवन चक्र की निरंतरता का प्रतीक माना गया है। इसकी विशाल छाया, विस्तृत जडे और अक्षय जीवन शक्ति यह संदेश देती है कि जीवन का वास्तविक आधार संरक्षण, समर्पण और संतुलन में निहित है। इस प्रकार वट सावित्री व्रत केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव जीवन के गहरे संबंध का सांस्कृतिक उत्सव भी है। आज जब आधुनिक समाज पारिवारिक विघटन, संबंधोमे संवेदनहीनता, पर्यावरण संकट और सांस्कृतिक विस्मृति जैसी अनेक चुनौतियो का सामना कर रहा है, तब वट सावित्री व्रत भारतीय जीवन-मूल्यों की पुनमृति के रूप में अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है। 


यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि त्याग, निष्ठा, धैर्य और आत्मबल का नाम है; परिवार केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि संस्कारों और संबंधो की जीवंत धरोहर है; और प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन की सहचरी है। इस दृष्टिसे वट सावित्री व्रत भारतीय संस्कृति की उस सनातन चेतना का प्रतीक मानागया है। वो पावन पर्व पुरे गुजरात मे उत्साह से मनाया गया।

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