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लखनऊ: जन्मदिन विशेष : आदर्शवादी राजनीति के पुरोधा: पहाड़ के विकास को 'मिशन' बनाने वाले डॉ. शिवानंद नौटियाल

 लखनऊ से ब्यूरो रिपोर्ट ttn24 


*जन्मदिन विशेष : आदर्शवादी राजनीति के पुरोधा: पहाड़ के विकास को 'मिशन' बनाने वाले डॉ. शिवानंद नौटियाल*

भारतीय राजनीति के समकालीन इतिहास में ऐसे गिने-चुने ही राजनेता हुए हैं, जिन्हें उनके पद या कद से नहीं, बल्कि जन-सरोकारों से जुड़े उनके ऐतिहासिक कार्यों की वजह से याद किया जाता है। डॉ. शिवानंद नौटियाल सियासत के उसी ध्रुवतारे का नाम है, जिन्होंने राजनीति की पथरीली पिच पर आदर्शों और शुचिता का एक ऐसा प्रतिमान स्थापित किया, जिसकी चमक आज भी फीकी नहीं पड़ी है। 

डॉ. नौटियाल महज़ सत्ता के गलियारों में जगह बनाने वाले नेता नहीं थे, उनकी आंखों में ढेरों सपने थे। लेकिन इन सपनों की तासीर अलग थी। ये सपने उन्होंने अपने व्यक्तिगत ऐश्वर्य के लिए नहीं, बल्कि समाज के उस अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए देखे थे, जिसकी तरफ़ बरसों से मुख्यधारा की राजनीति ने अपनी नजऱें फेर रखी थीं।

शिक्षा को बनाया बदलाव का हथियार:

डॉ. शिवानंद नौटियाल इस बुनियादी सच को बख़ूबी समझते थे कि समाज का वास्तविक उत्थान केवल नारों से नहीं, बल्कि ज्ञान के उजाले से संभव है। यही वजह थी कि उन्होंने बच्चों की बुनियादी शिक्षा को अपने जीवन का मुख्य ध्येय बनाया।

पहाड़ का दर्द और संघर्ष: 

उत्तराखंड जैसे विषम भौगोलिक और सीमित संसाधनों वाले क्षेत्र में, जहां अभावों की धुंध गहरी थी, वहां उन्होंने गरीब-गुरबों और वंचितों के हक की आवाज़ बुलंद की।

रोटी, कपड़ा और मकान से आगे की सोच : 

बुनियादी ज़रूरतों रोटी, कपड़ा और मकान के साथ-साथ उन्होंने इस बात पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया कि हर गरीब के बच्चे की पहुंच गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक कैसे हो। वे मानते थे कि शिक्षा ही वह इकलौती चाबी है, जो पीढिय़ों की गऱीबी के ताले को खोल सकती है। 

आमतौर पर लोग राजनीति को शक्ति और प्रभाव के माध्यम के रूप में देखते हैं, लेकिन डॉ. नौटियाल के लिए राजनीति कोई व्यवसाय या शौक नहीं, बल्कि एक पवित्र मिशन थी। इसी वजह से उन्होंने जन-कल्याणकारी सपनों को धरातल पर उतारने के लिए, चुनावी राजनीति की देहरी पर कदम रखा था।

लोकतंत्र की आत्मा के सच्चे रक्षक: 

समकालीन दौर में जहां जनप्रतिनिधि अक्सर चुनाव जीतने के बाद अपनी ही जनता से दूरी बना लेते हैं, वहीं डॉ. शिवानंद नौटियाल ने राजनीति में कदम ही इसलिए रखा था ताकि समाज के उस उपेक्षित वर्ग को मुख्यधारा में लाया जा सके, जिसके साथ आज भी व्यवस्था और समाज दो-रंगा बर्ताव करते हैं। उनका संपूर्ण जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि इच्छाशक्ति दृढ़ हो, तो राजनीति को लोक-कल्याण का सबसे सशक्त माध्यम बनाया जा सकता है। 

 डॉ. शिवानंद नौटियाल-पौड़ी की धरती से उठकर विधानसभा तक का प्रेरक सफर 

 डॉ. शिवानंद नौटियाल का जन्म 26 जून 1926 को पौड़ी जनपद के ग्राम कोटला में हुआ था। साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।वर्ष 1967 में उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा और दो वर्ष बाद, 1969 में पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र से विधायक निर्वाचित होकर जनसेवा के नए अध्याय की शुरुआत की। 

सियासी रिकॉर्ड बनाते हुए पौड़ी से दो और कर्णप्रयाग से छह बार जीत का परचम ! फहराया डॉ. शिवानंद नौटियाल का जनता के बीच आधार कितना मजबूत था, इसकी गवाही उनके चुनावी आंकड़े देते हैं। उनकी इसी अद्वितीय नेतृत्व क्षमता और दूरदर्शिता को देखते हुए साल 1979 में उन्हें उत्तर प्रदेश (संयुक्त) सरकार में उच्च शिक्षा एवं पर्वतीय विकास मंत्री की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई। वे केवल एक कद्दावर राजनेता ही नहीं थे, बल्कि एक प्रखर बुद्धिजीवी और लेखक भी थे । उन्होंने अपने जीवनकाल में कई कालजयी पुस्तकों की रचना कर साहित्य जगत में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी।

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