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फर्रुखाबाद में मोहर्रम की पांचवीं मजलिस,शादाब जैदी के नेतृत्व में आयोजित, मौलाना सदाकत हुसैन ने खिताब किया

 रेहान ख़ान रिपोर्टर फर्रुखाबाद 9452755077


फर्रुखाबाद में मोहर्रम की पांचवीं मजलिस,शादाब जैदी के नेतृत्व में आयोजित, मौलाना सदाकत हुसैन ने खिताब किया।

फर्रुखाबाद शहर की बूरा वाली गली में मोहर्रम की पांचवीं मजलिस का आयोजन किया गया। शादाब जैदी के नेतृत्व में आयोजित इस मजलिस को मुफ्ती फिदा हैदर इमामबाड़ा के मौलाना सदाकत हुसैन सैंथली ने खिताब किया। मौलाना अदील हसन ने अजादारी के महत्व पर प्रकाश डाला।


उन्होंने जनाबे फातेमा और इमाम हसन से जुड़ी एक घटना का जिक्र किया। मौलाना ने बताया कि एक बार जनाबे फातेमा ने इमाम हसन से मस्जिद जाकर नाना रसूल-ए-खुदा का खुतबा सुनने को कहा। इमाम हसन ने खुतबा सुना और वापस आकर अपनी मां को हूबहू सुनाया। जब मौला अली घर आए और जनाबे फातेमा ने उन्हें खुतबे के बारे में बताया, तो मौला अली ने पूछा कि वह तो मस्जिद नहीं गई थीं। जनाबे फातेमा ने जवाब दिया कि उनके बेटे हसन ने उन्हें बताया था।


मौलाना सदाकत हुसैन सैंथली ने अपने संबोधन में मोहर्रम की दूसरी तारीख का उल्लेख किया, जब इमाम हुसैन अपने लश्कर के साथ करबला पहुंचे थे। उन्होंने बताया कि इमाम हुसैन के घोड़े ने करबला की सरजमीं पर आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। इमाम साहब ने सात घोड़े बदले, लेकिन कोई भी घोड़ा आगे नहीं बढ़ा।

जब इमाम हुसैन ने वहां के लोगों से इस जमीन का नाम पूछा, तो कुछ ने नैनवा, कुछ ने गाजरिया और कुछ ने मारिया बताया। एक व्यक्ति ने यह भी बताया कि इसे करबला कहते हैं। जैसे ही इमाम हुसैन ने करबला नाम सुना, वे घोड़े से उतर पड़े।


इमाम हुसैन ने अपनी बहन जनाब जैनब से कहा कि यही वह जमीन है जहां उन्हें कयामत तक रहना है। इसके बाद उन्होंने मौला अब्बास को बुलाकर खेमे लगाने का हुक्म दिया। इमाम हुसैन ने बनी असद के लोगों को बुलाया और इमाम अली अकबर के नाम पर वह जमीन खरीद ली।


इस मजलिस में बड़ी संख्या में अजादार-ए-हुसैन मौजूद रहे। मौलाना सदाकत हुसैन सैंथली के बयान ने श्रोताओं को भावुक कर दिया। इस अवसर पर मौलाना सदाकत हुसैन सैंथली, सलीम हैदर, नादिर हुसैन, जावेद हैदर, शादाब जैदी, सैय्यद शबाब, इत्तदा हैदर, टीटू रिजवी और मोहम्मद हुसैन रिजवी सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।


मोहर्रम की पांचवीं तारीख को हुई मजलिस,मौलाना हसन अली ईश्फियानी ने कहा, मजलिस छोटी या बड़ी नहीं होती

फर्रुखाबाद शहर के मोहल्ला घेर शामू खां स्थित पूर्व जिलाध्यक्ष आफ़ताब हुसैन के निवास इमामबाड़ा मरहूम अनवर हुसैन में मोहर्रम की पांचवीं तारीख को मजलिस का आयोजन किया गया। इस मजलिस को खिताब फरमाते हुए मौलाना हसन अली ईश्फियानी ने कहा कि कोई भी मजलिस छोटी या बड़ी नहीं होती, वह केवल मजलिस होती है।


मौलाना ईश्फियानी ने बताया कि मोहर्रम अपने मुल्क (देश) से मोहब्बत का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन अपने नाना मोहम्मद साहब की पवित्र धरती पर खून-खराबा नहीं चाहते थे। इसी कारण उन्हें मजबूर होकर अपना वतन छोड़ना पड़ा। वतन छोड़ने का दुख इमाम को बहुत था।


मौलाना ने जोर देकर कहा कि यही वजह है कि मुसलमान, खासकर शिया, अपने मुल्क से मोहब्बत करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो लोग देश से नफरत करते हैं और आतंकवाद फैलाते हैं, वे हुसैनी नहीं हो सकते।


उन्होंने आगे कहा कि कर्बला की जंग के बाद दो ही कौमें बची हैं – एक यजीदी और दूसरी हुसैनी। जो लोग इमाम को मानते हैं, वे कभी देश से नफरत नहीं कर सकते। मौलाना ने कहा कि जो भी आतंकवाद फैलाए, उसे यजीदी समझा जाना चाहिए।

मौलाना ने मजलिस में इमाम पर हुए जुल्म का भी विस्तार से बयान किया। इस अवसर पर शबीहे पैगम्बर इमाम हुसैन के बेटे जनाब अली अकबर के ताबूत की शबीह बरामद की गई।


मौलाना हसन अली ईश्फियानी ने बताया कि इमाम हुसैन के बेटे अली अकबर को कर्बला में इमाम हुसैन के साथ 18 वर्ष की आयु में तीन दिन का भूखा-प्यासा शहीद कर दिया गया था। इस दौरान अम्मार अली ने नौहाख्वानी की, जिसमें दर्जनों अजादार शामिल हुए।


इस मौके पर पूर्व जिलाध्यक्ष आफ़ताब हुसैन, नफीस हुसैन, गुड्डू मोहसिन कासमी, वसीम अब्बास, अल्ताफ आब्दी, सैफ हुसैन आब्दी, अम्मार अली और मौलाना फरहत अली जैदी सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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