संवाददाता हितेश कुमार जोशी
महाकालेश्वर मंदिर के अनसुलझे रहस्य, जिन पर विज्ञान भी हैरान है!
उज्जैन महाकालेश्वर स्टोरी, यह हकीकत है उस मंदिर की जहां मौत भी माथा टेकती है, नाम है महाकालेश्वर, अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चांडाल का। काल भी उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल का। कालों के काल महाकाल की महिमा अद्भुत है। देश के अलग-अलग कोने में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग अपनी दिव्यता और सनातन के महत्व के कारण दर्शनीय हैं। इन्हीं में से मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर रहस्यों से भरा हुआ है। उज्जैन की पवित्र धरती पर स्थित भगवान शिव का यह रूप जो केवल पूज्य नहीं बल्कि भयानक भी है।हर मंदिर की एक कहानी होती है, लेकिन इस मंदिर की कहानी रहस्य, मृत्यु और चमत्कार के बीच कहीं अटकी हुई है। उज्जैन का महाकाल मंदिर कोई साधारण शिवलिंग नहीं है। यह भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, लेकिन इसका महत्व बाकी सभी से अलग है क्योंकि यहां विराजमान हैं कालों के भी काल महाकाल। कहते हैं जो इंसान महाकाल का नाम एक बार भी सच्चे मन से ले लेता है, उसके जीवन से डर और मृत्यु खुद पीछे हट जाते हैं।
लेकिन क्या यह सिर्फ आस्था है या इसके पीछे छुपे हैं कुछ ऐसे रहस्य जिन पर विज्ञान भी खामोश है? इस मंदिर का कई पौराणिक ग्रंथों में काफी सुंदर वर्णन देखने को मिलता है। देश-दुनिया से यहां सभी भगवान शिव के दर्शन करने पूरे साल आते हैं। लेकिन जितना महाकालेश्वर का मंदिर लोगों के बीच पॉपुलर है, उससे कहीं ज्यादा यह अपने अंदर कई रहस्यों को समेटे हुए है। तो सवाल यह उठता है कि वो कौन सी वजह थी जिसके कारण इस मंदिर में भस्म आरती इंसान की देह की राख से की जाती थी? और क्या आज भी यहां पर इंसान की देह की राख से ही भस्म आरती की जाती है?
क्या सच में यहां काल भी प्रवेश से पहले अनुमति मांगता है? क्यों कहते हैं कि यहां की आरती देखने मात्र से इंसान की आने वाली विपत्तियां टल जाती हैं, और वह कौन सी अनदेखी शक्ति है जो इस मंदिर से बाहर निकलते ही अदृश्य हो जाती है? इतिहासकार कहते हैं, यह केवल पौराणिक मान्यता है। लेकिन साधु-संत कहते हैं, जिसने महाकाल को देखा नहीं, उसने मृत्यु को कभी समझा ही नहीं। कहीं यह मंदिर समय के नियमों को मोड़ने वाला कोई द्वार तो नहीं, या फिर यह है एक ऐसा स्थान जहां आत्माएं चयन की तलाश में आती हैं?
और सबसे बड़ा सवाल, क्यों इस मंदिर के कोतवाल काल भैरव को शराब चढ़ाई जाती है? और आश्चर्यचकित कर देने वाली बात तो यह है कि यहां पर चढ़ाई गई सैकड़ों हजारों लीटर शराब आखिर कहां पर गायब हो जाती है? क्या काल भैरव स्वयं इस शराब का भोग कर लेते हैं? और जब अंग्रेजों ने शराब के इस रहस्य को सुलझाने की कोशिश करने के लिए मंदिर की खुदाई करवाई तब ऐसा क्या हुआ जिसे देखकर अंग्रेजों के पसीने छूट गए और डर से फिर कभी काल भैरव मंदिर में प्रवेश भी नहीं किया।
इतिहास में ऐसी कौन सी घटनाएं घटी हैं जिनकी वजह से उज्जैन में कोई भी मंत्री या प्रधानमंत्री रात नहीं ठहरता, और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस परंपरा को किस तरह से तोड़ा और उन्हें कुछ क्यों नहीं हुआ? आखिर क्यों इस मंदिर के सामने से बारात को नहीं गुजारा जाता है? क्यों भक्तों को अलग-अलग रूप में दर्शन देते हैं महाकाल? मंदिर के विस्तारीकरण के दौरान पुरातत्व विभाग को मिले नर कंकालों के पीछे आखिर कौन सा रहस्य छिपा है?
शिव पुराण की कथा केअनुसार,र बहुत समय पहले उज्जैन नगरी, जिसे अवंतिकापुरी के नाम से जाना जाता था, में पर चंद्रसेन नामक एक प्रतापी राजा राज करते थे। वे पराक्रमी तो थे ही, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान थी भगवान शिव का अनन्य भक्त होना। उनके राजमहल में एक अलौकिक शांति का माहौल था। उनका महल सुबह शाम भगवान शिव की आराधना, रुद्रा अभिषेक और मंत्र उच्चारण से गूंजता रहता था। राजा की मित्रता शिव के परमगण मणिभद्र से थी, जो स्वयं कैलाशवासी थे। एक बार जब उज्जैनीआए,ए तो उन्होंने चंद्रसेन को एक अनोखी चिंतामणि भेंट की। यह कोई साधारण रत्न नहीं था।
इसे धारण करने वाले के पास अपार ऐश्वर्य, यश और विजय स्वयं चले आते थे। बस फिर क्या था? मणि मिलने के बाद चंद्रसेन के वैभव की चमक चारों दिशाओं में फैल गई। वह न केवल शक्तिशाली राजा बन गए, बल्कि उनके नाम से शत्रु भी कांपने लगे। लेकिन वह कहते हैं ना कि जहां वैभव होता है, वहां ईर्ष्या भी पीछे नहीं रहती। जब यह बात आसपास के राजाओं को पता चली, तो चारों ओर के राजा उस चमत्कारी मणि को पाने की लालसा में जलने लगे।
एक दिन कुछ राजाओं के साथ मिलकर रिपुुरंजन और चंद्रभानु ने उज्जैनी पर चढ़ाई कर दी। युद्ध के नगाड़ों की गूंज से धरती थर्रा उठी। उनकी सेना के सामने चंद्रसेन की सेना काफी कमजोर थी। चंद्रसेन की सेना के सामने शत्रुओं की विशाल सेना थी। लेकिन राजा चंद्रसेन तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्हें विश्वास था कि उनकी शक्ति किसी मणि में नहीं, बल्कि महाकाल की भक्ति में है। इसलिए उन्होंने शस्त्र नहीं उठाए, बल्कि एक तपस्वी की तरह महाकाल वन की ओर बढ़ गए, जहां उन्होंने आंखें मूंद लीं और भगवान शिव के ध्यान में लीन हो गए। उन्होंने ओम नमः शिवाय मंत्र का जाप करना शुरू किया।
धीरे-धीरे उनकी आत्मा उस महाशक्तिशाली परम शिव में विलीन हो चुकी थी। उसी समय उज्जैनी में एक और संकट सिर उठा रहा था। वह था एक भयानक राक्षस दूषण जो वेद, यज्ञ और भक्ति का विरोधी था। उज्जैन में शिव भक्तों की बढ़ती संख्या और पूजा-पाठ देखकर वह क्रोधित हो उठा। वह अपने असुर सैनिकों के साथ उज्जैन पर आक्रमण करने निकल पड़ा। उसकी मंशा शिव भक्तों का अंत करना, मंदिरों को तोड़ना और भक्ति की जड़ें उखाड़ फेंकना और खुद को भगवान घोषित करना था। उसने उज्जैन की जनता पर अत्याचार करना शुरू कर दिया, जिसकी वजह से अवंतिका, यानी कि उज्जैन की जनता में हाहाकार मच गया और वह यहां-वहां अपनी जान बचाकर भागने लगे।
अब अवंतिका दो दिशाओं से घिर चुकी थी। एक ओर लोभी राजा और दूसरी ओर राक्षसी शक्ति। शहर भय, आशंका और अराजकता में डूब चुका था। इसी दौरान, आक्रमण के भय के कारण, अवंतिका के एक कोने से एक विधवा गोपी अपने 5 साल के बेटे के साथ आश्रय की तलाश में भटकती हुई उसी महाकाल वन में पहुंच गई। उसने देखा कि एक राजा जिसने जरूर ऐश्वर्य का जीवन जिया होगा, अब साधक की तरह तपस्या में लीन है। यह दृश्य अद्भुत था। उसका बालक जो उत्सुक और जिज्ञासु था, राजा को शिव की भक्ति में देखकर मंत्रमुग्ध हो गया। वह भी वहीं थोड़ी दूर बैठ गया और एक छोटा सा शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करने लगा।
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फूल, जल, बेलपत्र—जो भी पास मिला—वह शिवलिंग पर चढ़ाता गया। धीरे-धीरे वह शिवभक्ति में इतना खो गया कि मां की आवाजें भी उसे सुनाई नहीं दे रही थीं। उसकी मां बार-बार बुलाती रहीं, “आजा, बेटा, भूख लगी होगी।” लेकिन बालक का मन अब शिव में रम चुका था। अंत में मां का धैर्य जवाब दे गया। वह वहां पहुंची जहां उसका बेटा पूजा कर रहा था। क्रोध में आकर उसने पूजा की सारी सामग्री फेंक दी और बालक को पीटने लगी। “यह क्या पागलपन है?” लेकिन तभी कुछ चमत्कारिक घटा। अचानक वहां एक दिव्य तेज उत्पन्न हुआ। आकाश में घंटियों की ध्वनि गूंज उठी।
तेज रोशनी के बीच एक भव्य मंदिर का निर्माण होता दिखाई दिया, और जब सब शांत हुआ, तब उस जगह एक दिव्य शिवलिंग प्रकट हो चुका था, जिस पर वही फूल और बेलपत्र चढ़ाए हुए थे जो उस बालक ने पहले चढ़ाए थे। शिव स्वयं प्रकट हो गए। उनकी कृपा उस मासूम भक्त पर बरस पड़ी थी। मां हैरान रह गई थी, लेकिन उसने पहली बार जाना कि सच्ची भक्ति ना उम्र देखती है ना साधन; वह बस भाव देखती है। यह घटना जंगल में आग की तरह फैल गई। जब यह समाचार चंद्रसेन को मिला, तब वे दौड़े-दौड़े उस स्थान पर पहुंचे। उन्होंने देखा कि शिव स्वयं एक दिव्य लिंग रूप में प्रकट हुए हैं।
उनकी आंखों से आंसू बह निकले। उनका विश्वास, उनकी तपस्या, उनकी भक्ति अब मूर्त रूप में सामने थी। लेकिन यह सिर्फ भक्त की परीक्षा नहीं थी। यह राक्षस दूषण के अंत का समय भी था। जैसे ही शिव प्रकट हुए, उन्होंने अपना रौद्र रूप धारण कर लिया और महाकाल बन गए। उनकी जटाएं आकाश तक फैल गईं।
त्रिनेत्र से अग्नि निकली और हाथों में त्रिशूल लिए वह दूषण की ओर बढ़े और पल भर में ही दूषण और उसकी असुर सेना का अंत हो गया। उस क्षण जो चमत्कार घटा था, उसने युद्ध की आग को भी शांति में बदल दिया। जो राजा अभी तक मणि के लोभ में उज्जैनी को रौंदने चले थे, अब उसी धरती पर महाकाल की महिमा के आगे झुक गए थे।
उनके हाथों के शस्त्र गिर चुके थे और सिर शिव के चरणों में झुक चुका था। तभी से उज्जैन में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई और एक परंपरा जन्मी। जैसे काशी के राजा बाबा विश्वनाथ हैं वैसे ही उज्जैन के राजा भगवान महाकाल हैं। आज भी उज्जैन की हर सुबह शिव के नाम से शुरू होती है और हर रात महाकाल की आरती के साथ समाप्त होती है। क्योंकि वहां का राजा ना कोई मनुष्य है ना कोई सिंहासन पर बैठता है। वहां के राजा स्वयं महाकाल हैं। पौराणिक दृष्टिकोण से तो हमने जान लिया है कि महाकालेश्वर मंदिर का निर्माण कैसे हुआ था। लेकिन इस मंदिर ने भी बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखे हैं।
जिसमें मुगल काल में बहुत बार इस मंदिर को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया। कहा जाता है कि 1235 में महाकालेश्वर मंदिर को दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने पूरी तरह से नष्ट कर दिया था। इस बारे में हम सभी जानते हैं कि किस तरह मुस्लिम आक्रांताओं ने हिंदू धर्म को मिटाने के लिए उनके धार्मिक स्थलों को नष्ट करके वहां पर मस्जिदों का निर्माण करवाया था। उस समय महाकालेश्वर मंदिर लोगों के लिए आस्था का एक केंद्र माना जाता था, लेकिन जब इल्तुतमिश को इस बारे में सूचना मिली तो उसने तुरंत अपने सिपाहियों को मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया।
लेकिन जब हिंदुओं को इस बारे में पता चला, तो उन्होंने सिपाहियों के आने से पहले ही महाकाल मंदिर के गर्भगृह गृह में स्थित स्वयंभू ज्योतिर्लिंग को आक्रांताओं से सुरक्षित बचाने के लिए पास में ही बने एक कुएं में रख दिया था। इसके बाद औरंगजेब ने मंदिर के अवशेषों से वहां एक मस्जिद का निर्माण करवा दिया था।
मंदिर टूटने के बाद करीब 500 सालों से अधिक समय तक महाकाल का मंदिर जीर्णशीर्ण अवस्था में रहा और ध्वस्त मंदिर में ही महादेव की पूजा-आराधना की जाती रही। लेकिन जब कई वर्षों बाद 1728 में मराठा शूरवीर राणोजी राव सिंधिया ने मुगलों को परास्त किया, तब उन्होंने मंदिर तोड़कर बनाई गई उस मस्जिद को गिराया और 1732 में उज्जैन में फिर से मंदिर का निर्माण कर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की।
अब इतिहास और पौराणिक कथा के बाद अब हम बात करते हैं एक-एक करके महाकालेश्वर मंदिर से जुड़े हुए तमाम रहस्यों के बारे में
रहस्यमई स्वयंभू शिवलिंग-
महाकालेश्वर मंदिर में जो शिवलिंग मौजूद है, उसके बारे में कहा जाता है कि यह स्वयं उत्पन्न हुआ है। इसको किसी के द्वारा स्थापित नहीं किया गया है। यहां पर शिवलिंग कैसे प्रकट हुआ था? इसके बारे में हमने आपको वीडियो में पहले ही बता दिया है। महाकालेश्वर मंदिर में जो भी श्रद्धालु आता है, उसे खुद अनुभूति होती है कि वास्तव में यहां पर मौजूद शिवलिंग देवीय ऊर्जा से भरपूर है। भक्तों का मानना है कि महाकालेश्वर के शिवलिंग में उनकी गहरी इच्छाओं को पूरा करने और उन्हें बुरी शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करने की शक्ति है। महाकालेश्वर मंदिर के शिखर के ठीक ऊपर कर्क रेखा गुजरती है। इसलिए इसे पृथ्वी का नाभिस्थल भी कहा जाता है।
सावन के महीने में दूर-दूर से लोग महाकालेश्वर मंदिर आते हैं। पवित्र महीने के सोमवार को महाकाल के दर्शन बेहद शुभ माने जाते हैं। यहां कण-कण में शिव का वास है। यह भक्ति, आस्था और आराधना का वह दरबार है जहां भक्तों के सभी कष्टों का निवारण होता है और अंत में मोक्ष प्राप्त होता है।
महाकालेश्वर मंदिर के ज्योतिर्लिंग की सबसे खास बात यह है कि यह एकमात्र दक्षिण मुखी ज्योतिर्लिंग है। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, दक्षिण दिशा मृत्यु और परलोक से जुड़ी है। यही वजह है कि महाकाल के रूप में भगवान शिव इस दिशा में मुख किए हुए बैठे हैं। यह अनूठी विशेषता महाकालेश्वर को अन्य 11 ज्योतिर्लिंगों से अलग बनाती है, जो इसे एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक स्थल बनाती है।
नागचंश्वर मंदिर से जुड़ा रहस्य
उज्जैन के महाकाल मंदिर तीन तलों में बना हुआ है। सबसे नीचे वाले तल में जहां पर साक्षात महादेव का ज्योतिर्लिंग स्थापित है, वहीं मध्य तल में भगवान शिव को ओंकारेश्वर के रूप में पूजा जाता है। वहीं सबसे ऊपरी तल पर नागचंश्वर मंदिर है जो साल में सिर्फ एक बार नाग पंचमी पर खुलता है। ऐसी मान्यता है कि तक्षक नाग आज भी गुप्त स्थान पर यहां रहते हैं। यहां जो प्रतिमा स्थापित है वो मराठा काल की है। इस प्रतिमा में भगवान शिव देवी पार्वती के साथ शेषनाग पर विराजित हैं। विश्व में अन्य कहीं पर भी ऐसी प्रतिमा देखने को नहीं मिलती है।
मंदिर का राजा विक्रमादित्य से संबंध
राजा विक्रमादित्य को इतिहास के सबसे महान राजाओं में से एक माना जाता है जो अपनी बुद्धि, वीरता और भगवान शिव की भक्ति के लिए जाने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि विक्रमादित्य नियमित रूप से महाकाल से आशीर्वाद लेने के लिए महाकालेश्वर मंदिर आते थे।
विक्रमादित्य के साथ मंदिर का जुड़ाव ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ा देता है क्योंकि यह राजा की भक्ति और उनके शासनकाल के दौरान मंदिर के महत्व का प्रमाण है। विक्रमादित्य और मंदिर के साथ उनके जुड़ाव के बारे में कई कहानियां और किंवदंतियां पीढ़ियों से चली आ रही हैं जो उज्जैन की सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करती हैं। वेताल पचीसी और सिंहासन बत्तीसी जैसी कथाओं में विक्रमादित्य और महाकाल के संबंधों का वर्णन है। ये कथाएं बताती हैं कि विक्रमादित्य अपने निर्णयों से पहले महाकाल की आज्ञा लेते थे।
शराब से जुड़ा रहस्य
उज्जैन शहर से महज 8 कि.मी. की दूरी पर स्थित काल भैरव मंदिर आज करोड़ों लोगों के लिए आस्था का केंद्र है। जो भी भक्त महाकालेश्वर के दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं, वह अवश्य ही काल भैरव मंदिर जाते हैं क्योंकि बिना काल भैरव मंदिर जाए महाकालेश्वर के दर्शन अधूरे माने जाते हैं। मंदिर के पुजारियों के अनुसार इस मंदिर का वर्णन स्कंद पुराण के अवंती खंड में मिलता है। इस मंदिर में भगवान काल भैरव के वैष्णव स्वरूप का पूजन किया जाता है। काल भैरव भगवान शिव के रौद्र और तांत्रिक रूप हैं। मान्यताओं के अनुसार काल भैरव तामसिक प्रवृत्ति के देवता माने जाते हैं।
इसलिए उन्हें मदिरा, यानी शराब का भोग लगाया जाता है। इसलिए महाकालेश्वर मंदिर में भी बाबा काल भैरव को शराब चढ़ाने की परंपरा है। इस मंदिर में शराब चढ़ाने का प्रचलन सदियों से जारी है। लेकिन आज तक यह कोई भी नहीं जान सका कि बाबा काल भैरव को जो शराब चढ़ाई जाती है, आखिर वह जाती कहां है?
क्योंकि भक्तों का मानना है कि जो शराब बाबा काल भैरव को चढ़ाई जाती है, उसे स्वयं काल भैरव ही पी जाते हैं। इसके पीछे का कारण वहां से शराब का गायब हो जाना है। पुजारी शराब से भरा कटोरा भैरव के मुंह के सामने कर देते हैं और देखते ही देखते वह शराब मूर्ति के होठों से गायब हो जाती है। ऐसा लगता है मानो मूर्ति शराब पी रही हो।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मूर्ति में कहीं कोई सुराख या आउटलेट नजर नहीं आता। फिर भी शराब गायब हो जाती है। ब्रिटिश काल में एक अंग्रेज अफसर कैप्टन हंटर ने इस चमत्कार को धोखा मानते हुए शराब का पता लगाने के लिए मंदिर की खुदाई करा दी थी और मूर्ति को तुड़वाने की कोशिश भी की थी।
लेकिन उसके हाथ कुछ भी नहीं लगा। इस घटना के महज कुछ ही दिनों बाद अंग्रेज अफसर की रहस्यमयी तरीके से मौत हो गई। इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने मंदिर परिसर में किसी भी तरह की छेड़छाड़ करने से मना कर दिया। लेकिन अंग्रेजों की तरह इस रहस्य को उजागर करने की कोशिशें कुछ भारतीय वैज्ञानिकों, पत्रकारों और विदेशी पर्यटकों ने भी की थीं।
1916 के दशक में कुछ भारतीय वैज्ञानिकों और पुरातत्व विभाग से जुड़े विशेषज्ञों ने मंदिर की मूर्ति और संरचना का निरीक्षण किया। उन्होंने मूर्ति में छेद या पाइपलाइन की जांच करने की कोशिश की क्योंकि उनको ऐसा लगता था कि मूर्ति के अंदर कोई पाइपलाइन जुड़ी हुई है जिसके जरिए से शराब कहीं एक जगह पर जमा होती होगी। आधुनिक उपकरणों से स्कैनिंग भी की गई। लेकिन शराब का कहीं भी जमा होने का उन्हें कोई भी बहाना नहीं मिला। इसी तरह से कुछ जर्मन और फ्रेंच डॉक्यूमेंट्री टीमों ने काल भैरव मंदिर पर वीडियो बनाए। उन्होंने एचडी कैमरों और माइक्रोफोन से मूर्ति की हरकतें रिकॉर्ड करने की कोशिश की।
लेकिन कैमरे में मूर्ति के होठों से शराब गायब होती देखी गई। लेकिन उन्हें कोई छेद नजर नहीं आया। एक ब्रिटिश टीम ने इसे अ केस ऑफ कलेक्टिव डिवाइन इल्लुजन कहकर संबोधित किया। यानी यह आस्था और रहस्य का अद्वितीय मिश्रण है। डॉक्टर बाकंडकर तुरंत एक अपनी टीम को लेकर विक्रम विश्वविद्यालय से खुदाई करने पहुंचे और खुदाई की जमीन के अंदर तक और देखा कि वहां पर कहीं भी वो वाइन उन्हें दिखाई नहीं देती है। आज भी टैंकरों से यानी कि कहा जाता है कि निरंतर अगर कोई पाइप लाइन भी लगा दी जाए काल भैरव के मुख पर तो वो वाइन कहां जाती पता नहीं चलती है।
तो यह एक दुर्लभ प्रतिमा है जिसमें वाइन को गायब करने की शक्ति है, क्षमता है तो यह एक देवी शक्ति ही कह सकते हैं। इसके अलावा कई पत्रकारों ने काल भैरव मंदिर की रिपोर्टिंग की। लेकिन हर रिपोर्ट का निष्कर्ष यही रहा कि यह आस्था, तंत्र और चमत्कार का सम्मेलन है जिसे आज तक विज्ञान पूरी तरह नहीं समझ पाया है। कहा जाता है कि जब औरंगजेब के सैनिक काल भैरव मंदिर को नष्ट करने के लिए पहुंचे, तब अचानक कई सारे कुत्ते एक झुंड में प्रकट हुए और सैनिकों पर हमला कर दिया। कुत्तों के काटने से कई सैनिक घायल हो गए और उनमें से कुछ पागलपन का शिकार हो गए।
यह घटना इतनी भयावह थी कि सैनिकों ने एक दूसरे पर हमला करना शुरू कर दिया। औरंगजेब के सैनिक आपस में ही एक दूसरे को मारने, पीटने और काटने लगे। यह देखकर औरंगजेब घबरा गया और उसने अपने अंगरक्षकों को आदेश दिया कि वे उन सैनिकों को मार दें जो पागल हो गए हैं ताकि वे अन्य सैनिकों या स्वयं औरंगजेब पर हमला न कर सकें।
इस घटना के बाद औरंगजेब ने काल भैरव मंदिर पर आक्रमण का विचार त्याग दिया और वहां से लौट गया। इस मंदिर में जब किसी भक्त को कोर्ट के इस मुकदमे में सफलता हासिल होती है, तब वह बाबा के दरबार में आकर मावे के लड्डू का प्रसाद चढ़ातेा है। तो वहीं जिन भक्तों की सूनी गोद भर जाती है, तब वे यहां बाबा को बेसन के लड्डू और चूरमे का भोग लगाते हैं।
प्रसाद चाहे कोई भी क्यों ना हो, बाबा के दरबार में आने वाले हर भक्त सवाली होता है, और बाबा काल भैरव अपने आशीर्वाद से उसके कष्टों को हरने वाले देवता हैं। महाकाल की नगरी होने से काल भैरव को उज्जैन नगर का सेनापति भी कहा जाता है। काल भैरव को शत्रु नाशक भी कहा जाता है। यहां मराठा काल में महादजी सिंधिया ने युद्ध में विजय के लिए भगवान को अपनी पगड़ी अर्पित की थी। पानीपत के युद्ध में मराठों की पराजय के बाद तत्कालीन शासक महादजी सिंधिया ने राज्य की पूर्ण स्थापना के लिए भगवान के सामने पगड़ी रख दी थी।
उन्होंने भगवान काल भैरव से प्रार्थना की कि युद्ध में विजय होने के बाद वे मंदिर का जीर्णोद्धार करेंगे और फिर काल भैरव की कृपा से महादजी सिंधिया सभी युद्धों में विजय हासिल करते चले गए। इसके बाद उन्होंने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। तब से मराठा सरदारों की पगड़ी भगवान काल भैरव के शीश पर पहनाई जाती है।
भस्म आरती से जुड़ा रहस्य
भारत के ज्यादातर मंदिरों के अंदर भगवान की जब भी आरती की जाती है तो दिए की बाती को प्रज्वलित करके की जाती है। लेकिन महाकालेश्वर मंदिर में जब भगवान शिव की आरती की जाती है तब वह भस्म की राख से होती है। भस्म किसी भी वस्तु का अंतिम रूप होता है। चाहे वह इंसान हो या लकड़ी या कोई भी वस्तु जलने के बाद हमें अंत में भस्म ही प्राप्त होती है।
महाकालेश्वर मंदिर में की जाने वाली भस्म आरती हिंदू पूजा में सबसे अनोखी और मनमोहक रस्मों में से एक है। इसे देखने दूर-दूर से हजारों लाखों की संख्या में लोग यहां पर आते हैं। यह आरती हर सुबह लगभग 4:00 बजे की जाती है और इसमें भगवान शिव को पवित्र भस्म चढ़ाई जाती है।
इस अनुष्ठान को वास्तव में आकर्षक बनाने वाली बात यह है कि भस्म जले हुए कपिला गाय के गोबर, शमी, पीपल, बड़ और अमलताज से बनाई जाती है। लेकिन पुराने समय में इसे श्मशान घाट पर पहली चिता की राख से बनाया जाता था। जी हां, यह सच है। पहले यहां पर इंसान की देह की पहली चिंता की राख से ही भस्म आरती की जाती थी। लेकिन कुछ कारणों से अब इंसानी चिता की राख से भस्म आरती करना बंद कर दिया गया है। लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि यहां आज भी इंसान की चिता की राख से ही भस्म आरती होती है। लेकिन इस बात को गुप्त रखा जाता है।
इंसानी चिता की राख से भस्म आरती की परंपरा हजारों वर्ष पहले शुरू हुई थी। जब उज्जैन को अवंतिका कहा जाता था और यह क्षेत्र महाकाल वन कहलाता था। यहां पर भस्म आरती को देखने के लिए सैकड़ों हजारों की संख्या में भक्त आते हैं जो इसे देखने को बड़ा सौभाग्य मानते हैं। मंदिर के पुजारी मंत्रों और भजनों का उच्चारण करते हुए भक्ति के साथ आरती करते हैं जो मंदिर परिसर में गूंजती है। ऐसी मान्यता है कि जो भक्त एक बार भी इस आरती के दर्शन कर लेता है, फिर उसे कभी भी मृत्यु का भय नहीं सताता।
लेकिन महाकालेश्वर मंदिर में होने वाली भस्म आरती को केवल पुरुष ही देख सकते हैं। महिलाओं को यह आरती देखने की अनुमति नहीं है। इसलिए जब भस्म आरती शुरू होती है, तब महिलाओं को अपनी आंखें बंद करने के लिए या फिर बाहर जाने के लिए कहा जाता है। यहां भस्म आरती में शामिल होने के लिए किसी तरह का भी पहनावा पहन सकते हैं।
लेकिन अगर आप जलाभिषेक करना चाहते हैं तो उसके लिए पुरुषों को सिर्फ धोती और महिलाओं को सिर्फ साड़ी पहननी होती है। अन्य तरह के कपड़े पहने होने पर यहां जलाभिषेक करने की अनुमति नहीं है। भस्म आरती प्रकृति और मृत्यु की अंतिम वास्तविकता का प्रतीक है जो भक्तों में आध्यात्मिक जागृति को पैदा करती है।
श्मशान से जुड़ा रहस्य
भगवान शिव को शशान वासी कहा जाता है। वे संसार की मोह माया से परे हैं और जीवन के अंत को ही एक नई शुरुआत मानते हैं। शिव का निवास स्थान श्मशान ही माना गया है क्योंकि यहीं पर जीवन का अहंकार, दिखावा और पाखंड सब समाप्त हो जाते हैं। महाकालेश्वर मंदिर को लेकर ऐसा कहा जाता है कि यह मंदिर शमशान भूमि पर बना हुआ है।
महाकालेश्वर मंदिर का एरिया महाशमशान के नाम से जाना जाता है। प्राचीन समय में इस जगह पर मृतकों का अंतिम संस्कार किया जाता था। यही वजह है कि आज महाकालेश्वर मंदिर को तांत्रिकों का गढ़ भी कहा जाता है। हर साल यहां बड़ी संख्या में तांत्रिक पहुंचते हैं और बड़े-बड़े अनुष्ठान यहां पर पूर्ण किए जाते हैं। कामाख्या मंदिर के बाद अगर सबसे ज्यादा कहीं तांत्रिक तंत्र विद्या से जुड़ी हुई क्रियाएं की जाती है तो वे महाकालेश्वर मंदिर ही है।
कोई नेता और मंत्री यहां रात क्यों नहीं रुकते?
महाकालेश्वर मंदिर भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया भर में फेमस है। जिसके चलते भारत सहित विदेशों से भी दर्शन करने के लिए यहां लोग आते हैं। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए बड़ी-बड़ी हस्तियों के साथ ही राजनीतिक पदों पर आसीन मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति सभी लोग यहां आते हैं।
लेकिन महाकालेश्वर मंदिर के दर्शन करने के बाद कोई भी बड़ा नेता या मंत्री उज्जैन में नहीं रुकते हैं। अगर उन्हें रुकना भी होता है तो वह उज्जैन के बाहर किसी होटल या फिर कहीं और रुकते हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्यों तो आपको बता दें जो भी न
