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800 सालों से क्यों बंद है कोणार्क मंदिर का मुख्य द्वार? जानिए अंदर छिपा खौफनाक या अद्भुत सच

 संवाददाता हितेश कुमार जोशी


800 सालों से क्यों बंद है कोणार्क मंदिर का मुख्य द्वार? जानिए अंदर छिपा खौफनाक या अद्भुत सच!

एक गाथा है उस 12 साल के मासूम धर्मपद की जिसने 1200 लोगों की जान बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। यह कहानी है उस भव्य मंदिर की जहां सूर्य देव की मूर्ति हवा में झूला करती थी। यह कहानी है एक ऐसे श्रापित कोणार्क मंदिर की जहां कभी पूजा ना की जा सकी।आखिर कौन सी घटना घटी थी उस समय जिसने इस कोणार्क मंदिर को एक श्रापित मंदिर बना दिया? यह गाथा है उस कोणार्क मंदिर की जिसे एक नहीं, तीन-तीन बार ध्वस्त किया गया। क्या आप जानते हैं एक ऐसे मंदिर के बारे में जिसकी दीवारों पर बनी कामुक मूर्तियां बहुत कुछ बयां करती हैं? क्या आपको यह पता है कि अभी हमें जो कोणार्क मंदिर दिखाई देता है, वह असल में ऐसा नहीं हुआ करता था?

क्या आप यह जानते हैं? आक्रमणकारियों के आक्रमण के बाद पूरी तरह से खत्म हो जाने के बाद वर्षों तक रेत और जंगल से घिर जाने के बाद इस मंदिर को किसने और कैसे खोज निकाला? क्या सच में कोणार्क मंदिर की चुंबकीय शक्ति इतनी मजबूत थी कि समुद्र से गुजरते जहाज भी अपनी दिशा खो दें? आखिर कोणार्क मंदिर के गुंबद पर लगाया गया विशेष चुंबक से निर्मित पत्थर कहां से लाया गया था? आखिर ऐसी भी क्या मजबूरी थी जिसने इस मंदिर के दरवाजे को हमेशा हमेशा के लिए बंद करवा दिया? यह वो मंदिर है जिसकी हर दीवार और हर कोने में एक गहरा रहस्य छिपा है।

आज हम आपको बताएंगे कि कोणार्क मंदिर के खंडहर होने के पीछे की चुप्पी के पीछे काला पहाड़ का आक्रमण है या फिर एक ऐसा रहस्य है जिसे हम अब तक नहीं जान पाए हैं जो हमसे छुपा लिया गया। आज हम आपको कोणार्क के कोने-कोने में दबे उस हर एक रहस्य को बताएंगे जिन्हें आपने आज से पहले कभी नहीं सुना होगा। हमारा देश भारत रहस्यों से भरा हुआ है।


यहां कदम-कदम पर ऐसी जानकारियां मिलती हैं जिन्हें जानकर यकीन करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। इसके साथ ही हमारे देश में ऐसे कई मंदिर हैं जो काफी रहस्यमय हैं। इसी कारण हमारा देश एक हिस्टोरिकल देश माना जाता है जहां पर अनेकों टूरिस्ट प्लेसेस हैं जो हमारे देश के मजबूत इतिहास को बयां करते हैं।


वैसे यह तो अब पूरी दुनिया जानती है कि भारत देश के लोग सदियों से धार्मिक रहे हैं, जिसके कारण भारत में अनेकों धार्मिक टूरिस्ट प्लेसेस देखने को मिलते हैं, जिनका स्ट्रक्चर और नक्काशी लोगों को खूब अट्रैक्ट करती हैं। ऐसे ही देश के कई धार्मिक टूरिस्ट प्लेसेस में से एक कोणार्क का सूर्य मंदिर है, जिसके यूनिक स्ट्रक्चर और इसकी भव्यता के कारण हर दिन कोणार्क मंदिर देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग देश-विदेश से यहां आते हैं, जो कि भगवान सूर्य का मंदिर है।


यह मंदिर उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर में मौजूद है, जिसे मंदिरों की नगरी भी कहा जाता है। जिसकी सबसे खास बातों में से एक खास बात यह है कि अगर आप कभी उड़ीसा गए और यहां के सबसे खूबसूरत मंदिर, यानी कि कोणार्क सूर्य मंदिर को नहीं देखा, तो मानो आपकी उड़ीसा यात्रा अधूरी है। क्योंकि यह खूबसूरत कोणार्क सूर्य मंदिर भगवान सूर्यदेव को समर्पित है, और यह मंदिर उड़िया आर्किटेक्चर का एक शानदार नमूना है।


आज के इस वीडियो में हम आपको कोणार्क मंदिर से जुड़े सभी रहस्यों और इतिहास के बारे में सभी बातें बताने वाले हैं, ताकि आपके दिमाग में कोणार्क मंदिर से रिलेटेड कोई भी डाउट ना रहे। तो चलिए भारत के सबसे रहस्यमई मंदिरों में से एक, कोणार्क सूर्य मंदिर के इतिहास के पन्नों को पलटते हैं।


कोणार्क मंदिर का इतिहास: आपको यह तो पता ही होगा कि हिंदू धर्म में सूर्य देव को बहुत अधिक महत्व दिया जाता है क्योंकि सूर्य के कारण ही धरती पर जीवन है और माना जाता है कि सूर्य देव की आराधना करने से कुंडली के सभी दोष दूर हो जाते हैं। इसीलिए प्राचीन काल से ही सूर्य देव की पूजा-अर्चना की जाती रही है और वैदिक काल से ही कई बड़े-बड़े राजा-महाराजा सूर्य देव की आराधना करते आए हैं और अपनी मनोकामना पूरी होने पर सूर्य देव के लिए वे सूर्य मंदिरों का भी निर्माण कराते आए हैं।


इन्हीं मंदिरों में से एक कोणार्क का सूर्य मंदिर भी है, जो अपनी भव्य संरचना और वास्तुकला के लिए पूरे देश दुनिया में चर्चित है और भारत के प्रमुख सूर्य मंदिरों में से एक है जिसे पूरी तरह से सूर्य भगवान के लिए ही बनाया गया है। इसीलिए इस मंदिर की संरचना भी भगवान सूर्य से जुड़ी कलाकृतियों से जुड़ी हुई है।


इसलिए इस मंदिर का निर्माण इस प्रकार किया गया था कि सूर्य की पहली किरणें पूजा स्थल और भगवान की मूर्ति पर पड़ती हैं, जिसे देखने देश-दुनिया से बड़ी संख्या में श्रद्धालु कोणार्क आते हैं। वैसे, आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इतने खूबसूरत और attractive कोणार्क मंदिर के निर्माण को लेकर इतिहासकारों में मतभेद रहते हैं, जिनके बारे में कई जानकारों का अपना-अपना मत है, और उनके अनुसार इस मंदिर के निर्माण के बारे में माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण गंग वंश के तत्कालीन सावंत बहादुर और दूरदर्शी राजा लंगुला नरसिंह देव प्रथम ने करवाया था।


और कहा जाता है कि नरसिंह देव प्रथम ने इस मंदिर का निर्माण युद्ध जीतने के बाद भगवान को धन्यवाद करने के लिए उनकी आस्था में करवाया था, जबकि राजा नरसिंह देव प्रथम के युद्ध की कुछ अलग ही रोचक कहानी है, जो कहानी 13वीं शताब्दी में शुरू हुई थी जब 1206 ईसवी में दिल्ली से मोहम्मद गौरी का शासन समाप्त हो चुका था क्योंकि मोहम्मद गौरी की मृत्यु हो गई थी।


उसके बाद उसके गुलाम और सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की और भारत में गुलाम वंश का शासन शुरू हुआ। उसी दौरान, 13वीं शताब्दी में, भारत के अनेकों भागों में दिल्ली सल्तनत का विस्तार हुआ और इन मुस्लिम शासकों ने भारत के उत्तरी-पूर्वी राज्य और बंगाल प्रांत समेत कई राज्यों को जीत लिया था।


जबकि दक्षिण और पूर्वी भारत में क्षेत्रीय राजवंशों जैसे काकतीय, यादव, पांड्य, और कलिंग राजाओं का शासन था। ऐसे में उस समय लगभग हिंदू साम्राज्य खत्म होने के कगार पर पहुंच चुका था और ओसा में भी हिंदू साम्राज्य खत्म होने की उम्मीद लगने लगी थी। लेकिन इस स्थिति को देखते हुए कलिंग साम्राज्य और गंग राजवंश के शासक नरसिंह देव प्रथम ने मुस्लिम साम्राज्य को खत्म करने की हिम्मत दिखाई, और उन्होंने अपनी चतुर नीति से मुस्लिम शासकों पर आक्रमण किया और उनके खिलाफ युद्ध लड़े।लेकिन उसी दौरान काकतीय राजवंश के शक्तिशाली शासक गणपति देव ने कलिंग साम्राज्य पर हमला बोल दिया और फिर मुस्लिम शासक से लड़ने की जगह राजा नरसिंह देव प्रथम को काकतीय राजवंश के खिलाफ भयंकर युद्ध लड़ना पड़ा, और यह घमासान युद्ध 3 वर्षों तक दोनों राज्यों के बीच चला, लेकिन अंत में काकतीय राजा की हार हुई और नरसिंह देव विजय हुए, जिसके बाद राजा लंगुला नरसिंह देव बहुत सारा धन और वैभव लेकर घर लौटे।विजय होकर लौटने पर महल में ढोल-नगाड़ों से उनका भव्य स्वागत किया गया। तब राजमाता कस्तूरा देवी ने गर्व से अपने पुत्र को गले लगाया और उनकी वीरता का गुणगान किया। इसके साथ ही राजमाता कस्तूरी देवी ने अपने बेटे से सालों से दिल में दबी बात कही। उन्होंने राजा लंगुला नरसिंह देव से कहा कि बेटे, तुम्हारे पिता ने शंख क्षेत्र पुरी में भगवान जगन्नाथ का एक भव्य मंदिर बनवाया था, और अब मैं चाहती हूं कि तुम अर्क क्षेत्र कोणार्क में उससे भी अधिक भव्य और विशाल सूर्य मंदिर का निर्माण करवाओ।फिर अपनी मां की बात तो राजा ने मान ली, लेकिन उनके मन में एक विचार बार-बार आ रहा था कि आखिर मां कोणार्क में ही क्यों सूर्य मंदिर बनाने के लिए बोल रही है? और जब उन्होंने अपनी मां से यह सवाल पूछा, तो नरसिंह देव की मां ने उन्हें कोणार्क सूर्य मंदिर की एक पौराणिक धार्मिक कथा सुनाई जो कोणार्क मंदिर के महत्व और महिमा को दर्शाती है, जो इस मंदिर को भगवान कृष्ण से जोड़ती है। इस मंदिर के इतिहास की बात करें तो पुराणों के अनुसार, इस मंदिर के एक पवित्र तीर्थ होने का उल्लेख कपिल संहिता, ब्रह्म पुराण, भविष्य पुराण, सांबा पुराण, वराह पुराण में मिलता है।


उनमें इस प्रकार एक कथा लिखी हुई है जो द्वापर युग में घटी थी जिसके बारे में राजा नरसिंह देव को उनकी मां ने बताया था। राजमाता ने नरसिंह देव से कहा कि बेटा, भगवान श्री कृष्ण और जांभवती के पुत्र सांभ अत्यंत सुंदर और शीलवान थे। एक बार नारद मुनि ने ईर्ष्या में आकर उन्हें गोपियों संग झल क्रीड़ा के लिए उकसाया।


जब श्री कृष्ण को यह ज्ञात हुआ, तब उन्होंने क्रोध में सांप को श्राप दिया, जिससे वह कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गए। बाद में जब सच्चाई सामने आई, तब भगवान श्री कृष्ण को पछतावा हुआ। तब नारद मुनि ने बताया कि सूर्य भगवान ही चर्म रोग से मुक्ति दे सकते हैं और उन्हें कोणार्क क्षेत्र, यानी कि मैत्रीय वन, जहां भगवान सूर्य की पहली किरण उड़ीसा राज्य के कोने पर ही पड़ती है।


वहां सूर्य देवता की तपस्या करने को कहा। तब सांप कोणार्क गए और वहां चंद्रभागा नदी के तट पर 12 वर्षों तक कठिन तपस्या की। प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उन्हें एक मूर्ति दी, जिसके स्पर्श से सांप रोग रोगमुक्त हो गए। कृतज्ञता स्वरूप सांप ने वहीं सूर्य मंदिर का निर्माण कराया जो कोणार्क के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बेटा, जब मेरी शादी तुम्हारे पिता से हुई थी, तब हमारे कई वर्षों तक कोई संतान नहीं हुई थी।


तब हमने कोणार्क क्षेत्र में भगवान सूर्य से प्रार्थना की, जिसके फल स्वरूप तुम्हारा जन्म हुआ। अब अपने जन्म और सा की कथा के बारे में अपनी मां, राजमाता कस्तूरी देवी, से जानकर राजा नरसिंह देव प्रथम बहुत खुश हुए, और फिर उन्होंने 13वीं शताब्दी में सूर्यदेव को समर्पित कोणार्क सूर्य मंदिर को विश्व का सबसे भव्य सूर्य मंदिर बनाने का फैसला लिया है, जिसके लिए राजा ने प्रसिद्ध मूर्तिकार सिवई सामंत राय और उनके साथ ही वास्तुकार महाराणा बिसु को मंदिर बनाने की जिम्मेदारी दी।


फिर दोनों ने मिलकर सूर्य मंदिर का एक सुंदर प्रतिरूप बनाया और राजा नरसिंह देव को दिखाया, जिसे देखकर राजा खुश हो जाते हैं और मंदिर बनाने का काम तुरंत शुरू करने का आदेश देते हैं, और योजना बनाई गई कि भव्य सूर्य मंदिर का निर्माण कोणार्क के चंद्रभागा नदी के तट पर पद्म टोला गंड नामक स्थान पर किया जाएगा, जहां सूर्य की पहली किरणें मंदिर के विशाल शिखर पर पड़ेंगी, जिसके बाद मूर्तिकार सिवई सामंत राय और वास्तुकार महाराणा बिसु मंदिर मंदिर बनाने के लिए देश के कोने-कोने से एक से एक बेहतरीन 1200 शिल्पकारों को बुलाते हैं।


जिनके बदौलत कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण बड़ी ही अद्भुत शैली में होता है, और इसी कड़ी में कोणार्क मंदिर के निर्माण में काफी घटना भी घटती है जिसके बारे में आपको आगे वीडियो में पता चलेगा जो आपके होश उड़ा देंगी क्योंकि यह मंदिर कोई आम मंदिर नहीं है, बल्कि यह एक अजूबा है, और हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जिस तरह से इस मंदिर के बनाने वाले की कहानी रोचक है,वैसे ही इस मंदिर को बनने में लगे पत्थरों की भी कहानी काफी मजेदार है क्योंकि इस मंदिर के आसपास बहुत दूर तक किसी पर्वत के चिन्ह नहीं हैं। ऐसी अवस्था में इस विशालकाय मंदिर को बनाने के लिए जो पत्थर लगे, वो कहां से और कैसे लाए गए, यह एक अनसुलझी पहेली से कम नहीं है। दरअसल इस मंदिर का स्वरूप और बनावट अद्भुत शिल्पकला का नमूना है जिसका निर्माण कलिंग स्थापत्य शैली के तहत किया गया था, जो बलुआ पत्थर और ग्रेनाइट से बना है। इसके अलावा, कोणार्क मंदिर को ब्लैक पगोड़ा भी कहा जाता है क्योंकि यह समुद्र के किनारे काले रंग के पत्थरों से बना है, जो एक बहुत बड़े और भव्य रथ के समान है।


जबकि इसे बनाने के लिए दूर-दूर से बड़े-बड़े पत्थर लाए गए। फिर इन बड़े पत्थरों को बड़ी सपाट लकड़ी की नावों पर लादकर नदी के बीच में ले जाकर नदी में गिराया गया ताकि मंदिर निर्माण के लिए समतल स्थल तैयार हो सके। लेकिन नदी में चाहे जितने भी पत्थर डाले जाते, वे तुरंत डूब जाते थे।


जिससे सब परेशान हो रहे थे। लेकिन फिर एक दिन जब मूर्तिकार सिवई सामंत राय एक झोपड़ी के बरादे में इसी बात पर विचार कर रहे थे कि आखिर कैसे वह जल्दी से जल्दी मंदिर बनाने के लिए समतल भूमि तैयार करें, उसी वक्त वहां एक बूढ़ी माता ने उन्हें गर्म बाजरे का दलिया खाने को दिया, और तब सिवई सामंत राय ने जल्दी-जल्दी में खाने के लिए अपना हाथ गर्म खाने के बीच में डाल दिया, जिससे उनका हाथ जल गया, और यह देखकर बूढ़ी माता ने कहा, “बेटा, गर्म खाना हो या फिर नदी में जाने से पहले किनारे सही करने पड़ते हैं।”


उनकी बात सुनकर सिवई सामंत राय को समझ आ गया कि नदी की भूमि समतल कैसे होगी, और यह जानने के बाद उन्होंने बूढ़ी माता को प्रणाम किया और वहां से नदी की तरफ चले गए, और एक सही योजना के साथ उन्होंने नदी को भरने के लिए किनारे से पत्थर डालना शुरू कर दिया और मंदिर निर्माण के लिए एक समतल स्थल तैयार करने में सफल रहे.


जिससे मंदिर का निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ने लगा, और वही वही राजा ने यह आदेश भी दिया था कि जब तक मंदिर का काम पूरा नहीं हो जाता, किसी को भी घर जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी, जिसके चलते 12 साल तक 1200 कारीगरों ने इस मंदिर को बनाने के लिए कठिन परिश्रम किया और एक भव्य मंदिर का निर्माण किया।


लेकिन उन सब की आखिरी चुनौती तब सामने आई जब उन्होंने मंदिर का कलश स्थापित करने की कोशिश की और उन सभी की लाख कोशिशों के बाद भी कोणार्क मंदिर के गुंबद पर विशाल चुंबकीय कलश को उचित स्थान पर स्थापित नहीं किया जा सका, जिससे सभी लोग निराश होने लगे और इधर काफी अधिक समय बीत जाने पर राजा अधीर हो गए। फिर राजा ने परेशान होकर यह आदेश दिया कि यदि अगले दिन सुबह तक कलश स्थापित न हुआ तो सभी कामगारों और शिल्पकारों को मृत्युदंड दे दिया जाएगा। जहां एक तरफ महाराणा विषु की जान पर बात आ गई थी।


वहीं दूसरी तरफ, उनकी पत्नी और उनका पुत्र धर्मपद, जो 12 साल का होने वाला था, वह अपने जन्मदिन पर अपने पिता महाराणा बिसु से पहली बार मिलने के लिए अपनी मां से जिद कर रहा था क्योंकि उसने आज तक अपने पिता को नहीं देखा था क्योंकि जब उसके पिता मंदिर बनाने के लिए कोणार्क जा रहे थे, तब वह अपनी मां के गर्भ में था, और अब जब वह 12 साल का होने वाला है, तब तक उसके पिता घर लौट कर नहीं आए थे।


लेकिन धर्मपद अपनी मां से अपने पिता की शिल्प कला की कहानियां सुनते हुए बड़ा हुआ था, और इसलिए उसे बचपन से ही वास्तुकला और शिल्प कला में रुचि थी, और एक महान मंदिर वास्तुकार विषु विषुमहाराणा का बेटा होने के नाते उसके पास मंदिर निर्माण के विवरण का वर्णन करने वाली हस्तलिपि थी।


इसलिए जब वह 12 साल का हुआ तब तक उसने ओडिया मंदिर वास्तुकला की कला में महारत हासिल कर ली थी। लेकिन वह हमेशा उदास रहता था, क्योंकि उसने अपने पिता को कभी नहीं देखा था। इसलिए अपने 12वें जन्मदिवस पर उसने अपनी मां से एक उपहार के तौर पर अपने पिता से मिलने का मौका मांग लिया, जिसके बाद उसकी मां ना चाहकर भी अपने बेटे को अपने पिता से मिलने जाने से रोक ना सकी और धर्मपद की मां ने उसे साथ ले जाने के लिए कुछ खाना दिया और उसे अपना कुत्ता बलिया को अपने साथ ले जाने के लिए कहा ताकि उसके पिता उसे बलिया को देखकर पहचान जाए।


फिर जब वह मंदिर के निर्माण स्थल पर पहुंचा तो बलिया ने अपने मालिक विषु महाराणा को पहचान लिया और उनके पास गया। फिर धर्मपद भी अपने पिता से मिलकर उन्हें प्रणाम किया और उन्हें अपना परिचय दिया। उनके पिता उससे मिले, लेकिन उनके चेहरे पर खुशी का भाव नहीं था क्योंकि वह कलश स्थापित ना कर पाने की चिंता से परेशान थे, और फिर जब धर्मपद ने अपने पिता से उनकी चिंता का कारण पूछा तो उन्होंने उसे सारा सच बता दिया, जिसे सुनने के बाद धर्मपद ने अपने पिता से कहा कि अगर आप मुझे अनुमति दें तो मैं मंदिर के गुंबद पर कलश स्थापित कर सकता हूं।


जिसके बाद कोई चारा ना दिखने पर विषु महाराणा ने अपने बेटे को कलश स्थापित करने की अनुमति दे दी, और तभी धर्मपद मंदिर के गुंबद पर चढ़ गया, जहां उसने अपनी सूझबूझ और अध्ययन से शिल्पकारों को कुछ महत्वपूर्ण समायोजन की बातें बताईं, जिससे कुछ ही समय में कलश अपनी जगह पर स्थापित हो गया, और कलश स्थापित होने के साथ ही वहां पर उसी समय एक चमत्कार हुआ। दरअसल, कलश स्थापित होते ही गुंबद के भीतर चुंबक की शक्ति के कारण सूर्य भगवान की भव्य मूर्ति हवा में झूलने लगी, जिससे वहां मौजूद कलाकार खुशियों से झूम उठे।

लेकिन वहीं कुछ कलाकारों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि कल जब राजा को पता चला कि जो काम 1200 शिल्पकारों की टोली से नहीं हुआ, उसे एक 12 साल के लड़के ने कर दिखाया, तो राजा जरूर सोचेंगे कि हम अपना काम ठीक से नहीं कर रहे थे और हम सभी को मौत की सजा दे दी जाएगी। अब यह सुनकर कुछ लोगों ने तर्क दिया कि धर्म पद को हमेशा के लिए चुप करा दिया जाए तो 1200 शिल्पकारों की जान और इज्जत दोनों बच सकती है।


लेकिन जब विषु महाराणा ने यह सुना तो वह गुस्सा हो गए। उन्होंने सबसे कहा कि आज ही मैं अपने बेटे से पहली बार मिला हूं और आज ही तुम लोग इसे मारने की बात कर रहे हो। लेकिन बात 1200 कामगारों की जान और एक 12 साल के बच्चे की जान के बीच आप फंँसे थे।


जिसे देखकर धर्मपद ने महसूस किया कि उसकी सफलता ने उसके पिता को कितने तनाव में डाल दिया है। इसलिए उसने एक दिल दहला देने वाला फैसला कर लिया। वह तभी भीड़ के बीच से गुजर कर मंदिर के शिखर पर चढ़ गया और कुछ देर में वह कलश के शिखर पर जाकर खड़ा हो गया। वहां उसने देखा कि जिस कलश को उसने अभी-अभी स्थापित किया था, वहां सूर्य की किरणें मंदिर को छू रही थी और ऐसा लग रहा था कि मानो सूर्यदेव मंदिर पर अपना आशीर्वाद बरसा रहे हों। तभी धर्मपद ने मंदिर के शिखर से नदी के गहरे पानी में छलांग लगा दी और वह डूब गया।


जिसे देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखों से आंसू बहने लगे, क्योंकि एक 12 साल का बालक जो अब तक सही से दुनिया नहीं देखा था, वो दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर बनाकर 1200 कलाकारों का जीवन बचाने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया। जिसका जिक्र मुगल शासक अकबर के नवरत्नों में से एक अबुल फजल ने भी अपनी किताब आईने-अकबरी में किया है, जिसमें अबुल ने लिखा है कि इस मंदिर में उड़ीसा राज्य के 12 वर्ष की सारी कमाई लगी थी।


कोणार्क मंदिर को सूर्य देवता के रथ के आकार का बनाया गया था, और यह मंदिर समय की गति को भी दर्शाता है, जिसमें रथ के 12 जोड़ी पहिए लगे हुए हैं और रथ को सात बलशाली घोड़े खींच रहे हैं। ये सात घोड़े सात दिनों के प्रतीक हैं, जबकि यह भी माना जाता है कि ये 12 पहिए साल के 12 महीनों के प्रतीक भी हैं।


कहीं-कहीं इन 12 जोड़ी पहियों को दिन के 24 घंटों के रूप में भी देखा जाता है। इस मंदिर में आठ ताड़ियां भी हैं, जो दिन के आठ प्रहर को दर्शाती हैं, और इसे देखने पर ऐसा लगता है कि मानो इस रथ पर स्वयं सूर्य देव बैठे हैं। इसके साथ ही यह मंदिर 29 फीट ऊंचा है। इस मंदिर में सूर्य के उगने, ढलने और डूबने के सभी स्टेप्स को दर्शाया गया है।


इस मंदिर का परिसर लगभग 26 एकड़ भूमि में फैला हुआ है। मंदिर के दक्षिणी हिस्से में दो घोड़े बने हुए हैं, जिन्हें राज्य सरकार द्वारा अपने राज चिन्ह के तौर पर भी चुना गया है। इस मंदिर के अंदर सूर्य भगवान की मूर्ति को ऐसे रखा गया था कि उगते हुए सूर्य की पहली किरण उस पर आकर गिरती थी, जिसकी रोशनी से पूरा मंदिर जगमगा उठता था। मंदिर के अंदर जगह-जगह पर फूलबेल और ज्यामितीय नमूनों की सुंदर नक्काशी की गई है।


इनके साथ ही मानव, देव, गंधर्व, किन्नर आदि के सुंदर चित्रों को भी एन् मुद्राओं में दिखाया गया है। वहीं इस मंदिर की सबसे रोचक बात यह है कि मंदिर के लगे चक्रों पर पड़ने वाली छाया से हम समय का सही और सटीक अनुमान लगा सकते हैं। यह प्राकृतिक धूप घड़ी का काम करता है। लेकिन इन सब के अलावा इस मंदिर के कई और अजीबोगरीब रहस्य भी हैं, जिस वजह से इस मंदिर को लोग आठवां अजूबा कहते हैं। उन्हीं में से एक था इस मंदिर की चुंबकीय ताकत। इस मंदिर के ऊपर 51 मीट्रिक टन का चुंबक लगा हुआ था, और यह माना जाता है कि इस मंदिर को चुंबकीय पत्थरों से बनाया गया था।


जिसके गर्भ गृह के शीर्ष पर एक विशाल चुंबकीय पत्थर रखा गया था, जो मंदिर की संरचना को स्थिर रखता था। इसका इफेक्ट इतना ज्यादा था कि इसके कारण समुद्र से गुजरने वाले जहाज इस चुंबकीय क्षेत्र के चलते भटक जाया करते थे और इसकी ओर खींचे चले आते थे, और इन जहाजों में लगा कंपास, यानी कि दिशा सूचक यंत्र, गलत दिशा दिखाने लग जाता था। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि इससे परेशान होकर पुर्तगालियों ने इस पत्थर को हटाने का काफी प्रयास किया, और काफी मेहनत मशक्कत के बाद उन्होंने मंदिर के बहुमूल्य चुंबक को हटा दिया और उसे अपने साथ ले गए।


जहाजों के दिशा भटकने को लेकर आपको किसी प्रकार का कोई कंफ्यूजन ना हो। इसलिए हम आपको बताना चाहेंगे कि यह कोणार्क मंदिर पहले समुद्र के बहुत ही नजदीक हुआ करता था। लेकिन पिछले आठ दशक में समुद्र से इस मंदिर की दूरी धीरे-धीरे बढ़ती चली गई। अब हम आपको जो बताने जा रहे हैं, वह सुनने में आपको थोड़ा अटपटा भले ही लगे, लेकिन अगर आप इस मंदिर को देखेंगे, तो इस मंदिर को इस प्रकार बनाया गया था कि जैसे कोई सैंडविच हो जिसके बीच में लोहे की परत थी, जिस पर मंदिर के पिलर अटके हुए थे।


जिसके कारण ही लोग इस बात पर यकीन करते हैं कि कोर्नार्क के पास से गुजरने वाले जहाज सच में खींचे चले आते थे क्योंकि यह मंदिर अद्भुत तरीके से बनाया गया था और इसके साथ ही जिस तरह से यहां सूर्य भगवान की मूर्ति बनी थी, वैसी मूर्ति किसी भी भगवान की कहीं नहीं बनाई गई क्योंकि इस मंदिर में सूर्य भगवान की हवा में तैरती हुई एक विशाल मूर्ति बनाई गई थी जिस पर लगभग एक “52 टन का चुंबक” (52-ton magnet) मंदिर के ऊपरी हिस्से में लगाया गया था।


निचले हिस्से में दो पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए लोहे की चादर और चुंबक का इस्तेमाल किया गया था, जिससे निचले हिस्से में लगे चुंबक के बीच में एक खिंचाव तैयार होता था। अब यह तो हुई भगवान सूर्य की मूर्ति की बात। लेकिन इसके अलावा, कोणार्क मंदिर की दीवारों पर की गई बारीक से बारीक नक्काशी बेहद अद्भुत है, जिसके बारे में कहते हैं कि इसमें वैसे तो तीन प्रकार की नक्काशी है।


जिसमें पहला धार्मिक दृश्य, यानी कि सूर्य देवता और अन्य देवताओं की मूर्तियां; वहीं दूसरा सामाजिक जीवन, यानी कि नृत्य, संगीत और सामूहिक उत्सव; और तीसरा कामुक दृश्य, यानी कि मंदिर की दीवारों पर कामुक शिल्प कला भी दिखाई देती है जो कामसूत्र से प्रेरित है। यह जीवन के सभी पहलुओं को संतुलित रूप से दर्शाने का प्रतीक है, और कोणार्क का सूर्य मंदिर कामुकता को एक नई परिभाषा देता है।


मध्य प्रदेश के खजुराहो मंदिर की तरह ही इस मंदिर की दीवारों पर बनी मूर्तियों में बड़ी ही खूबसूरती के साथ काम और सेक्स को दर्शाया गया है। यहां बनी मूर्तियां पूर्ण रूप से यौन सुख का आनंद लेती दिखाई गई हैं। महाकालेश्वर मंदिर के अनसुलझे रहस्य, जिन पर विज्ञान भी हैरान है

मजे की बात यह है कि इन मूर्तियों को मंदिर के बाहर तक ही सीमित किया गया है, और ऐसा करने के पीछे का कारण यह बताया जाता है कि जब भी कोई मंदिर के गर्भगृह गृह में जाए तो वह सभी प्रकार के सांसारिक सुखों और मोहमाया माया को मंदिर के बाहर ही छोड़कर आए, जबकि कहा जाता है कि यहां आज भी कामुकता नाचती है। तभी तो कोणार्क मंदिर के बारे में एक मिथक यह भी बोला जाता है कि यहां आज भी नर्तकियों की आत्माएं आती हैं।


अगर यहां के क्षेत्रीय लोगों की मानें तो आज भी यहां आपको रात को उन नर्तकियों की पायलों की झंकार सुनाई देगी जो कभी यहां राजा के दरबार में नृत्य किया करती थी। इन सब के अलावा इस मंदिर के द्वार पर जो सिंह की मूर्ति बनी है, उसका भी अपना ही एक अलग इतिहास है। दरअसल मंदिर के प्रवेश द्वार पर दो विशालकाय सिंहों की मूर्तियां हैं जो हाथियों को कुचल

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