ब्यूरोचीफ शैलेन्द्रसिंह बारडोली गुजरात
बुद्ध का आचरण ओर पंचशील पालन मे समाज मे नशामुक्ति आंदोलन कई बस्तीयों में शराब की भट्ठीया बंध करवाई गई।
14 अक्टूबर 1956 का वह ऐतिहासिक संकल्प नागपुर की दीक्षाभूमि। लाखों लोगों की उपस्थिति। डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने 22 प्रतिज्ञाओं के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा ली। यह केवल धर्म परिवर्तन नहीं था, यह एक सामाजिक क्रांति का उद्घोष था। बाबासाहेब ने कहा था: “मैं हिन्दू धर्म में पैदा हुआ, यह मेरे वश में नहीं था, पर हिन्दू रहकर नहीं मरूंगा, यह मेरे वश में है।”वर्तमान पीढ़ी की जिज्ञासा है कि ' बाबासाहेब ने बौद्ध धम्म को क्यों चुना'? भगवान बुद्ध की कौन सी शिक्षाएँ थीं जिन्होंने उन्हें आकर्षित किया? और सबसे बड़ा प्रश्न उनके अनुयाई, नव बौद्ध समाज ने, पिछले 70 वर्षों में उन शिक्षाओं का कहाँ तक पालन किया
22 प्रतिज्ञाओं में पहला वचन था “मैं ब्रह्मा, विष्णु, महेश को नहीं मानूँगा।” पर व्यवहार में कई नव बौद्ध परिवारों में दिवाली पर लक्ष्मी पूजन, सत्यनारायण कथा, और गांव के देवता को नारियल चढ़ाना जारी है।
डर से, समाज के दबाव से, या आदत से। बाबासाहेब ने कहा था “धर्म परिवर्तन मन का परिवर्तन है।” पर कई जगह केवल बोर्ड बदला, भीतर वही अंधश्रद्धा रही। महाराष्ट्र के कुछ गाँवों में ‘बौद्ध’ नाम लिखकर भी ‘माता की चौकी’ बैठती है। यह बुद्ध की ‘प्रज्ञा’ — तर्क की शिक्षा का उल्लंघन है।
नैतिक आचरण और पंचशील! पालन हुआ क्या: नव बौद्ध समाज में नशामुक्ति आंदोलन चले। कई बस्तियों में शराब की भट्टियाँ बंद करवाई गईं। ‘दारू छोड़ो, बुद्ध को जोड़ो’ जैसे नारे लगे। हिंसा और अपराध दर में भी तुलनात्मक कमी आई क्योंकि शिक्षा बढ़ी।
आजीविका’ का पालन अधूरा है। कुछ क्षेत्रों में अवैध धंधे, ब्याज का काम, या सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार के आरोप भी इसी समाज के लोगों पर लगते हैं। ‘मुसावादा वेरमणी’ — झूठ न बोलना — का सिद्धांत व्यवहार में पूरी तरह नहीं दिखता। बुद्ध ने कहा था ‘सम्यक वाणी’ — कठोर, निंदा, चुगली से बचो। पर सोशल मीडिया पर नव बौद्ध युवाओं का एक वर्ग प्रतिक्रिया में उतनी ही घृणा और गाली का प्रयोग करता है जितनी उन पर की जाती है। यह ‘करुणा’ और ‘मैत्री’ के विरुद्ध है। बाबासाहेब ने दुश्मन से भी नफरत नहीं, व्यवस्था से संघर्ष सिखाया था।
शिक्षा और प्रज्ञा — सबसे मजबूत पक्ष। यहाँ पालन सबसे अधिक हुआ। बाबासाहेब का संदेश था — “शिक्षा शेरनी का दूध है, जो पिएगा वो दहाड़ेगा।” नव बौद्ध समाज ने इसे अक्षरशः माना। पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी, मिलिंद कॉलेज जैसे संस्थान खड़े किए। आज इस समाज की साक्षरता दर महाराष्ट्र की औसत से अधिक है। लड़कियों की शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया। यह बुद्ध के ‘अप्प दीपो भव’ और बाबासाहेब के ‘शिक्षित बनो’ का सबसे सुंदर संगम है।
चूक कहाँ हुई: शिक्षा डिग्रियाँ तक सीमित रह गई। ‘प्रज्ञा’ यानी विवेकशील चिंतन कम विकसित हुआ। कई शिक्षित युवा भी व्हाट्सएप फॉरवर्ड पर आँख मूंदकर विश्वास कर लेते हैं। बुद्ध ने कहा था ‘एहि पस्सिको’ — आओ, खुद देखो, परखो। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण अभी जन-जन तक नहीं पहुँचा।
5. संगठन और संघर्ष।
पालन हुआ क्या?: बाबासाहेब का दूसरा मंत्र ‘संगठित रहो’ था। रिपब्लिकन पार्टी, बामसेफ, भारत मुक्ति मोर्चा जैसे संगठन बने। अन्याय के खिलाफ आवाज उठी। नामांतर आंदोलन, रिडल्स आंदोलन इसके उदाहरण हैं।
चूक कहाँ हुई: ‘संगठित’ के स्थान पर ‘विखंडित’ ज्यादा हुए। एक रिपब्लिकन पार्टी टूटकर 50 गुटों में बंट गई। अहंकार, पद की लड़ाई, और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा ने ‘संघ’ की भावना को चोट पहुँचाई। बुद्ध का संघ ‘त्याग’ पर आधारित था, आज का संगठन अक्सर ‘सत्ता’ पर आधारित दिखता है। बाबासाहेब ने कहा था “मुझे मेरे समाज के शिक्षित लोगों ने धोखा दिया।” यह दर्द आज भी प्रासंगिक है।
निष्कर्ष निकलता है कि: आगे का मार्ग क्या हो! हर शहर और गांव चौराहे पर बाबासाहेब की मूर्ति के हाथ के इसारे को अनुयायियों ने कहाँ तक पालन किया? उत्तर है — कुछ भी नहीं!! 90% राजनीतिक असफलता।
नोकरी पेशा में चुनौती ही चुनौती।
मन का पूर्ण परिवर्तन अभी बाकी है। 22 प्रतिज्ञाओं का अक्षरशः पालन, पंचशील का आचरण, जाति-पाँति का पूर्ण निर्मूलन, और घृणा के बदले करुणा का व्यवहार — यह अभी साध्य है, सिद्ध नहीं।
बाबासाहेब ने धर्म दिया, पर धम्म बनाना समाज को है। उन्होंने मार्ग दिखाया, चलना उनके अनुयाई को है। बुद्ध ने कहा था — “तुम्हें अपना काम खुद करना है, तथागत तो केवल मार्गदर्शक हैं।”
नव बौद्ध समाज के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती ‘नवयान’ को ‘कर्मकांड’ बनने से बचाना है। बुद्ध की मूर्ति लगाकर अगर मन में वही द्वेष, वही अंधश्रद्धा, वही जाति-अभिमान रहे, तो यह धर्मान्तरण नहीं, केवल ‘लेबल’ परिवर्तन होगा।
आवश्यकता है ‘प्रज्ञा, शील, करुणा’ के त्रिरत्न को व्यक्तिगत जीवन में उतारने की। जब हर नव बौद्ध युवा 22 प्रतिज्ञाओं को केवल जुबान से नहीं, जीवन से दोहराएगा; जब वह किसी से नफरत नहीं करेगा, बल्कि अन्याय से लड़ेगा; जब वह शिक्षा को डिग्री नहीं, विवेक बनाएगा तभी बाबासाहेब का सपना पूरा होगा।उन्होंने अपने समाज को बुद्ध दिया। अब महार, मातंग , मेहतर चमार जातियों को बुद्ध को जीना है। क्योंकि धम्म अंततः पोथी में नहीं, बर्ताव में बसता है। और यही नव बौद्ध समाज का सबसे बड़ा सरोकार होना चाहिए।
इन सब से बढ़कर झुग्गी झोपड़ी बनाकर रहना और नशा की आदत से छुटकारा पाने का हर सदस्य, नेता, अभिनेता, लेखक और चिंतक को बाबा सहाब की ही भांति प्रयास करने की आवश्यकता है।
