ब्यूरोचीफ शैलेन्द्रसिंह बारडोली गुजरात
गुजरात मे छोटे चुनाव का बडा संदेश गोधरा सिर्फ एक शहर नहीं बल्कि भारत की सांप्रदायिक और हिंसक सियासत का एक घृणित इतिहास भी है।
पिछले दिनों यहाँ हुए स्थानीय निकाय चुनाव में आए एक परिणाम ने नफरत की सियासत के विरुद्ध ऐक ऐसा संदेश दिया है जो काबिले तारीफ भी है और एक नजीर भी.गुजरात के गोधरा के नगर निगम में 44 सीटों पर चुनाव हुए. इस चुनाव में पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने यहां निकाय चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल किया है।
कांग्रेस का यहां खाता भी नहीं खुल पाया है. लेकिन चुनाव नतीजों के बाद सबसे ज़्यादा चर्चा उन अपेक्षाबेन सोनी की हो रही है जिन्होंने गोधरा की 97 फीसदी मुस्लिम बहुल आबादी वाली सीट पर जीत दर्ज की है. निर्दलीय उम्मीदवार होने के बावजूद अपेक्षा बेन यहां से जीतने में सफल रहीं।
अपेक्षाबेन सोनी गोधरा के वार्ड नंबर सात से खड़ी हुई थीं. यहां 97 फीसदी मतदाता मुस्लिम समुदाय से हैं. सूत्रों के मुताबिक, अपेक्षाबेन सोनी के पास किसी बड़े राजनीतिक दल का संरक्षण नहीं था इसके बावजूद यहां जीत हासिल करना एक राजनीतिक सफलता के साथ-साथ समाजिक समीकरणों के ताने-बाने का भी प्रतीक है।
मुस्लिम समुदाय के लोगों ने जीत के बाद अपेक्षा सोनी की उनके दिवंगत पिता के साथ की फोटो के साथ जुलूस निकालकर जीत का जश्न मनाया।चुनाव में अपेक्षाबेन को 2,762 वोट मिले. इस वार्ड में आम आदमी पार्टी ने अपना एक उम्मीदवार खड़ा किया था, जो हार गया. जबकि भाजपा, कांग्रेस और औबेसी ने इस वार्ड से कोई कैंडिडेट नहीं खड़ा किया था. बताया गया कि अपेक्षाबेन यहां के लोगों के लिए नयी उम्मीदवार थीं. लेकिन लोगों ने उनपर भरोसा किया और बड़े अंतर से चुनाव जिताया।
भाजपा ने मन मारकर अपेक्षा बेन को जीत की बधाई दी. अपेक्षाबेन ने कहा कि उनकी जीत आपसी भाईचारे और सम्मान का प्रतीक है.
सवाल ये है कि ये सब उस गुजरात में कैसे हुआ जहाँ पिछले ढाई दशक से हिंदुत्व का अलख जगाए रखने वाली भाजपा का राज है. दरअसल गुजरात हो या असम, बंगाल हो या केरल किसी भी राज्य में हिंदुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे से कोई परेशानी नहीं है, किंतु भाजपा की राजनीति इस समरसता की घोर विरोधी है।
भारत एक गणराज्य है. यहाँ बहु भाषा, धर्म और जाति के लोग सदियों से मिल जुलकर रहते आए हैं. तब भी जब मुगल सल्तनत थी और तब भी जब अंग्रेजों की सत्ता रही. दोनों के बीच विभाजन की रेखा और बैमनस्य तो भारत की आजादी के पहले जन्मे आर एस एस और मुस्लिम लीग जैसे संगठनों ने पैदा किया था. भारत का दुर्भाग्य ये है कि आजादी के 79 साल बाद भी ये विभेदकारी संगठन न सिर्फ मौजूद हैं बल्कि इन्हे अह केंद्रीय सत्ता का भी संरक्षण प्राप्त है।
गोधरा के वार्ड 44 से निकले समरसता के इस संदेश को देश भर में पहुंचाने की जरूरत है. ऐसे ही छोटे संदेश देश को धर्म, जाति और भाषा के नाम पर गडबडी फैलाने वाले तत्वों का मुकाबला कर सकते हैं. गोधरा के वार्ड 44 की मुस्लिम बहुल आबादी ने ध्रुवीकरण की राजनीती करने वालों को आइना दिखाया है. मानो तो मुंह पर थप्पड भी मारा है.ये सिलसिला जारी रहना चाहिए।
आगामी 4 मयी को आने वाले 5राज्य विधानसभा चुनावों के नतीजों से भी यदि गोधरा के वार्ड 44 जैसा संदेश निकले तो यकीन मानिये केंचुआ, सांप, तोता, मैना सब सरकार के सुर में सुर मिलाना भूल जाएंगे. बधाई अपेक्षा बेन सोनी और उनके मतदाताओं को. गोधरा के वार्ड 44 का संदेश जेठ के महीने में सीरी हवा का एक झोंका सा लगा।

