‘आयुष्मान’ का अमृत या कमीशन का कुंड? – इलाज के नाम पर खेल बड़ी सेटिंग का कारनामा।
चन्दगीराम मिश्रा
हरदोई यूपी
देश में स्वास्थ्य सेवा अब दो हिस्सों में बंट चुकी है—एक वो, जो कागजों और भाषणों में दिखती है; दूसरी वो, जो अस्पताल के बिल में झलकती है। और इन दोनों के बीच जो पुल बना है, उसका नाम है—कमीशन, सेटिंग और ‘आयुष्मान’ का खेल।कभी डॉक्टरों को भगवान कहा जाता था, लेकिन अब लगता है कि भगवान भी अस्पताल का बिल देखकर दो बार सोचें। इलाज से ज्यादा ‘इनवॉइस’ का इलाज हो रहा है—और मरीज की बीमारी से ज्यादा उसकी जेब की गहराई पर रिसर्च किया जा रहा है।
अस्पतालों में अब बीमारी नहीं, ‘पैकेज’ एडमिट होते हैं। खांसी हो या बुखार—सीधे टेस्टों की बारात, स्कैन की शहनाई और बिल का बैंड-बाजा। डॉक्टर की पर्ची अब इलाज का कागज कम, कमीशन का रोडमैप ज्यादा लगती है।
और अब आइए इस खेल के सबसे चमकदार मोहरे पर—‘आयुष्मान योजना’। नाम ऐसा कि लगे जैसे गरीब के लिए जीवनदान उतर आया हो। “पांच लाख तक मुफ्त इलाज”—सुनकर दिल खुश हो जाता है। लेकिन जैसे ही मरीज अस्पताल की दहलीज पर कदम रखता है, यह ‘मुफ्त इलाज’ शर्तों, बहानों और बहिष्कार में बदलने लगता है।
“यह बीमारी कवर में नहीं है…”
“यह पैकेज अलग है…”
“यह दवा बाहर से लेनी पड़ेगी…”
यानी ‘आयुष्मान’ का अमृत धीरे-धीरे ‘आप ही मान जाइए’ में बदल जाता है।
लेकिन असली खेल तो पर्दे के पीछे चलता है—जहां ‘फर्जी मरीज’ भी स्वस्थ होकर भर्ती हो जाते हैं। कागजों में बीमार, हकीकत में तंदुरुस्त। अस्पताल के रिकॉर्ड में ऑपरेशन, लेकिन हकीकत में सिर्फ ‘ऑपरेशन’ सिस्टम का होता है। आयुष्मान के नाम पर फाइलें भरती हैं, बिल बनते हैं और सरकारी खजाने से पैसा ऐसे निकलता है जैसे कोई एटीएम खुला छोड़ दिया गया हो।
कहीं-कहीं तो हाल यह है कि असली मरीज लाइन में खड़ा रहता है और फर्जी मरीज ‘पैकेज’ लेकर अंदर चला जाता है। यानी बीमारी अब शरीर में नहीं, सिस्टम में है—और उसका इलाज किसी स्कैन मशीन में नहीं मिलेगा।
अब जरा सरकार की भूमिका भी देख लीजिए। योजनाएं बनाने में सरकार अव्वल—घोषणाएं इतनी कि लगे स्वास्थ्य व्यवस्था बस स्वर्ग बनने ही वाली है। लेकिन निगरानी के नाम पर वही पुराना राग—“जांच के आदेश दे दिए गए हैं।”
ये आदेश इतने दिए जाते हैं कि अब आदेश भी खुद जांच की मांग करने लगें।
सरकारी अस्पतालों की हालत किसी से छिपी नहीं—डॉक्टर कम, सुविधाएं कम, भीड़ ज्यादा। ऐसे में सरकार खुद ही मरीजों को निजी अस्पतालों की ओर धकेलती है और फिर कहती है—“सब कुछ नियंत्रण में है।”
किसका नियंत्रण है—यह सवाल पूछना अब लगभग ‘अस्वस्थ’ व्यवहार माना जाता है।
दवाइयों का खेल भी कम नहीं। बाहर मिलने वाली सस्ती दवा अस्पताल के अंदर ‘महंगे भरोसे’ में बदल जाती है। और अगर कोई सवाल करे, तो उसे गुणवत्ता और सुरक्षा का पाठ पढ़ा दिया जाता है—मानो मरीज नहीं, कोई ट्रेनिंग सेशन चल रहा हो।
सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि इस पूरे खेल में मरीज ही सबसे ईमानदार किरदार है—जो सच में बीमार है, सच में परेशान है और सच में भुगतान करता है। बाकी सब ‘भूमिकाएं’ निभा रहे हैं—कोई सेवा के नाम पर, कोई योजना के नाम पर, और कोई निगरानी के नाम पर।
जरूरत इस बात की है कि ‘आयुष्मान’ को कागजों से निकालकर हकीकत में उतारा जाए, फर्जीवाड़े पर लगाम लगे और अस्पतालों को कमीशन के अड्डे बनने से रोका जाए। लेकिन फिलहाल तो हाल यह है कि इलाज से ज्यादा ‘इलाज के नाम पर खेल’ चल रहा है।
वरना वह दिन दूर नहीं जब अस्पतालों के बाहर बोर्ड लगे होंगे—
“यहां आयुष्मान योजना के तहत इलाज होता है—असली मरीज कृपया लाइन में रहें, फर्जी मरीज सीधे काउंटर पर आएं।”
अंत में बस इतना ही—बीमारी से बचिए, क्योंकि आजकल सिस्टम का इलाज किसी अस्पताल में नहीं होता।
