ब्यूरोचीफ शैलेन्द्रसिंह बारडोली गुजरात
वर्षा आधारित कृषि पर निर्भर आदिवासी परिवारों की वन भूमि पर अंधाधुंध खनन।
सरकार आदिवासी पिछड़े क्षेत्रों के उत्थान के लिए चाहे कितनी ही योजनाएँ बना ले, अंततःभ्रष्ट अधिकारी ही सरकारी योजनाओं का लाभ अपने घर ले जाते हैं।आजादी के पचास साल बाद भी आदिवासी क्षेत्र पिछड़े ही बने हुए हैं, जिसका प्रमाण दांग जिले में सरकारी कार्यों के नाम पर आम किसानों की जमीनों को बंजर भूमि में बदलने का निरंतर कार्य से आदिवासी परिवारों में भारी आक्रोश है।
गुजरात के सबसे दूरस्थ क्षेत्रों में गिने जाने वाले दांग जिले में स्थानीय लोगों के बीच इस बात को लेकर तीखी बहस चल रही है कि वन भूमि के हकदार और मौसमी किसान के रूप में साधारण जीवन यापन करने वाले आदिवासियों की कृषि भूमि को जानबूझकर नष्ट करने की साजिश रची जा रही है। आज जिले के कई गांवों में सरकारी योजनाओं के नाम पर भूमि को बंजर बनाया जा रहा है। इसकी वजह आदिवासी परिवार जो बारिसकी मौसममें कड़ी मेहनतसे साल भरके परिवारके गुजारा करने फसल ले रहे वोही आदिवासी समुदाय की भूमि बंजर बनानेका प्रयास हो रहाहे तब भाजपा पार्टीके कोई मुखिया आदीवासी की शिकायत सुनने को तैयार नहीं कैसी कमनसीबी ये सामान्य जनताकि आज हो चुकी है।सरकार ने आदिवासियों को जंगलों में ज़मीन आवंटित कर दी है और मशीनों की मदद से कहीं से भी खुदाई और पाइपलाइन बिछाने का काम चल रहा है। भ्रष्ट अधिकारी चल रही योजनाओं के बारे में स्थानीय लोगों को सूचित तक नहीं करते।
क्या यह सच है कि भाजपा के राजमा आदिवासी चुनाव प्रचार के दौरान हज़ारों करोड़ की योजनाओं का प्रचार करने वाले बड़े-बड़े भाषण देने तक ही सीमित रह गए हैं? चुनाव के बाद, पिछड़े क्षेत्रों में विकास के नाम पर अधिकारियों द्वारा खुलेआम भ्रष्टाचार की शिकायतें स्थानीय लोगों ने गांधीनगर तक कीगई बावजूद, कोई जांच नहीं की जा रही है। यह स्पष्ट है कि आदिवासियों का इस्तेमाल केवल वोटों के लिए किया जा रहा है।

