आनन्द बॉबी चावला ब्यूरो चीफ झांसी।
दिनांकः19.01.2026
*कृषि विश्वविद्यालय में 21 दिवसीय शीतकालीन प्रशिक्षण कार्यक्रम का भव्य समापन*
*जलवायु अनुकूल शुष्क भूमि फसलों के लिए उन्नत प्रजनन तकनीकों पर हुआ वैज्ञानिक मंथन*
*जलवायु परिवर्तन वर्तमान समय की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती है - कुलपति*
*“आधुनिक तकनीकें ही जलवायु-स्मार्ट कृषि का भविष्य” - निदेशक आईजीएफआरआई*
झाँसी। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झाँसी में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (आईसीएआर) द्वारा प्रायोजित 21 दिवसीय शीतकालीन प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल एवं गरिमामय समापन आज किया गया। “शुष्क भूमि फसलों में जलवायु अनुकूलता एवं तीव्र आनुवंशिक सुधार हेतु एकीकृत प्रजनन दृष्टिकोण” विषय पर आधारित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 30 दिसंबर 2025 से 19 जनवरी 2026 तक आयोजित किया गया, इसमें देश-विदेश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों एवं शोधकर्ताओं ने सहभागिता की।समापन सत्र की *अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. अशोक कुमार सिंह* ने कहा कि “जलवायु परिवर्तन वर्तमान समय की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती है और कृषि क्षेत्र इससे सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है। ऐसे में शुष्क भूमि फसलों के लिए जलवायु अनुकूल, टिकाऊ एवं उच्च उत्पादक किस्मों का विकास समय की आवश्यकता है। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम वैज्ञानिकों को आधुनिक पादप प्रजनन, जीनोमिक्स एवं नवाचार आधारित तकनीकों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बना है, इससे भविष्य में किसानों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। उन्होंने इस सफल आयोजन के लिए आईसीएआर, प्रशिक्षण समन्वयक एवं समस्त आयोजन टीम को बधाई दी।*मुख्य अतिथि डॉ. पंकज कौशल, निदेशक, भारतीय चारा एवं चरागाह अनुसंधान संस्थान (आईजीएफआरआई), झांसी* ने कहा कि आधुनिक तकनीकें ही जलवायु-स्मार्ट कृषि का भविष्य है। उन्होंने कहा कि “जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए वैज्ञानिकों को पारंपरिक प्रजनन के साथ-साथ जीनोमिक्स, फीनोटाइपिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाना होगा। इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम शोधकर्ताओं को भविष्य की कृषि के लिए तैयार करते हैं और देश की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।” उन्होंने प्रतिभागियों से आह्वान किया कि वे इस प्रशिक्षण से अर्जित ज्ञान को अपने-अपने संस्थानों एवं क्षेत्रीय अनुसंधान में प्रभावी रूप से लागू करें।
*निदेशक शोध एवं प्रशिक्षण पाठ्यक्रम निदेशक डॉ. एस.के. चतुर्वेदी* ने बताया कि इस प्रशिक्षण के दौरान कुल 36 विशेषज्ञ व्याख्यान एवं 15 प्रायोगिक सत्र आयोजित किए गए। इनमें सूखा, ताप एवं जलभराव सहनशील फसलें, तनाव शरीर क्रिया विज्ञान, जलवायु अनुकूल पादप प्रजनन, जीनोमिक्स आधारित प्रजनन, क्यूटीएल मैपिंग, जीन संपादन, पोषण संवर्धन, बीज प्रणाली, बौद्धिक संपदा अधिकार तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग जैसे विषयों पर गहन चर्चा की गई। उन्होंने कहा कि सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ प्रक्षेत्र भ्रमण एवं प्रयोगशाला आधारित प्रशिक्षण ने प्रतिभागियों को अनुसंधान एवं व्यवहारिक ज्ञान का समन्वित अनुभव प्रदान किया।साथ ही उन्होंने बताया कि इस शीतकालीन प्रशिक्षण में यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया (अमेरिका), ट्यूबेरोसम टेक्नोलॉजीज़ (कनाडा), इंटरनेशनल सेंटर फॉर बायोसलाइन एग्रीकल्चर (दुबई), आईसीआरआईसैट, आईआरआरआई सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थानों तथा आईसीएआर के विभिन्न राष्ट्रीय संस्थानों के वैज्ञानिकों ने वर्चुअल माध्यम से मार्गदर्शन प्रदान किया। इसके साथ ही देश के 11 राज्यों उत्तर प्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तेलंगाना एवं जम्मू-कश्मीर से आए 25 प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण में भाग लेकर इसे अत्यंत उपयोगी एवं ज्ञानवर्धक बताया। प्रतिभागियों ने अपने अनुभव सांझा करते हुए रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झाँसी की विभिन्न क्रिया कलापों की प्रशंसा की। सभी प्रशिक्षणार्थियों को अतिथियों ने प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया।इस अवसर पर निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. एस.के. सिंह, अधिष्ठाता उद्यानिकी एवं वानिकी डॉ. मनीष श्रीवास्तव, डॉ. एमजे डोबरियाल, डॉ. पुनीत चौधरी, डॉ. आशुतोष श्रीवास्तव सहित विभागाध्यक्ष, प्राध्यापक, उपस्थित रहे। संचालन डॉ. रुमाना खान ने तथा डॉ राकेश चौधरी ने सभी लोगों का आभार व्यक्त किया।
आनन्द बॉबी चावला झांसी।



