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नई दिल्ली। न्यायपालिका की गरिमा पर हमला लोकतंत्र के लिए खतरा, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने जज तबस्सुम खान को मिली धमकियों की कड़ी निंदा की

 नेशनल ब्यूरो हेड एवं लीगल एडवाइजर अधिवक्ता राजेश कुमार की विशेष रिपोर्ट | 

हेडलाइन न्यायपालिका की गरिमा पर हमला लोकतंत्र के लिए खतरा

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने जज तबस्सुम खान को मिली धमकियों की कड़ी निंदा की

रिपोर्ट: चैनल के नेशनल ब्यूरो हेड एवं लीगल एडवाइजर, अधिवक्ता राजेश कुमार की इंडिया बार काउंसिल से विशेष रिपोर्ट

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के एक चर्चित लिंचिंग मामले में गोरक्षकों को दोषी ठहराकर सजा सुनाने के बाद अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान को सोशल मीडिया पर धमकियां दिए जाने और उनके विरुद्ध चलाए जा रहे कथित दुष्प्रचार अभियान पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने कड़ा रुख अपनाया है।

3 जुलाई 2026 को जारी अपने आधिकारिक बयान में एससीबीए ने कहा कि किसी न्यायाधीश को उनके न्यायिक निर्णय के कारण धमकाना, डराने का प्रयास करना या सोशल मीडिया के माध्यम से नफरत फैलाना कानून के शासन और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।

एससीबीए ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय और मध्य प्रदेश सरकार से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष एवं प्रभावी जांच कराई जाए, दोषियों की पहचान कर उनके विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए तथा न्यायाधीश की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

न्यायपालिका पर दबाव लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती

भारत का संविधान न्यायपालिका को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अधिकार देता है। न्यायाधीश का दायित्व कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देना है, न कि किसी भी प्रकार के जनदबाव, राजनीतिक दबाव या सोशल मीडिया अभियान से प्रभावित होना।

यदि कोई व्यक्ति किसी फैसले से असहमत है, तो भारतीय कानून उसे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में अपील का अधिकार देता है। लेकिन किसी न्यायाधीश को धमकाना, उनकी छवि खराब करना या हिंसा के लिए उकसाना लोकतांत्रिक व्यवस्था और न्याय प्रणाली दोनों के लिए गंभीर खतरा है।

समाज के लिए सख्त संदेश

यह मामला पूरे समाज के लिए एक स्पष्ट संदेश देता है कि—

न्यायाधीश केवल कानून के अनुसार निर्णय देते हैं।

किसी फैसले से असहमति होने पर कानूनी उपाय अपनाए जाने चाहिए।

न्यायाधीशों को धमकाना, डराना या उनके विरुद्ध नफरत फैलाना किसी भी सभ्य लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक और प्रत्येक संवैधानिक संस्था का दायित्व है।

संपादकीय टिप्पणी

किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्वतंत्र न्यायपालिका होती है। यदि न्यायाधीश अपने निर्णयों के कारण भय या दबाव में आ जाएंगे, तो आम नागरिक का न्याय पर विश्वास कमजोर होगा। इसलिए न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा, सम्मान और स्वतंत्रता सुनिश्चित करना केवल सरकार की ही नहीं बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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