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अपना अहंकार और शर्तों को गुरुदेव के चरणों में रख देना: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज

 अपना अहंकार और शर्तों को गुरुदेव के चरणों में रख देना: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज

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           "सादर जय सियाराम"

आज हम समस्त संत भक्तवृंद एक पर विचार करेंगे ।

"पूज्य गुरुदेव भगवान की अहेतु कृपा पात्र को ही प्राप्त होती ।"

अहेतु का तात्पर्य है बिना किसी स्वार्थ के बिना किसी कारण के , बिना किसी शर्त के ।

गुरुदेव की कृपा ऐसी ही होती है 

वो किसी हिसाब से नहीं आती वो तो करुणा से आती है ।

गुरुदेव की अहेतु कृपा को धारण करने के लिए हृदय का पात्र होना जरूरी है आवश्यक है

पूज्य गुरुदेव भगवान की कृपा का प्रवाह निरंतर है पर धारण वही कर पाता है जो पात्र हो । 

पात्रता का तात्पर्य है हृदय का साफ होना ।

जैसे साफ पात्र साफ बर्तन में रखा जल शुद्ध रहता है ।

वैसे ही शुद्ध अंत: करण में कृपा ठहरती है ।

गुरुदेव की कृपा बादल की तरह है ।

बादल यह नहीं देखता कि खेत अच्छा है या बुरा है ।

वह तो केवल बरसता है , पर जो खेत तैयार है , जोता-बोया गया है वही फसल देता है ।

इसी तरह से कृपा सब पर बराबर बरसती है ।

पर धारण वही कर पाता है जो पात्र हैं ।

पात्र का तात्पर्य है अंत: करण की शुद्धी ।

पहली पात्रता है श्रद्धा : अपने पूज्य गुरुदेव भगवान के बचनों पर संदेह न होना ।

संदेह से द्वार बंद हो जाता है ।

जब अपने पूज्य गुरुदेव में संदेह होता है , तो कृपा का जल वहीं से बह जाता है ।

जब अपने पूज्य गुरुदेव के वचनों पर पूर्ण विश्वास होता है ।

तो कृपा भीतर प्रवेश करती है ।

श्रद्धा ही कृपा को ग्रहण करने की योग्यता प्रदान करती है ।

दूसरी पात्रता है समर्पण : समर्पण का तात्पर्य है मैं और मेरा , सब गुरुदेव के चरणो में सौंप देना ।

अपना अहंकार और शर्तों को गुरुदेव के चरणों में रख देना ।

 हम अक्सर कहते हैं कि कृपा हो पर साथ में अपनी शर्तें भी रखते हैं  

जब तक अहंकार और अपनी योजना बीच में है तब तक गुरुदेव की कृपा पूर्णतः नहीं उतरती ।

तीसरी पात्रता है संस्कार : बिना संस्कार के पूज्य गुरुदेव भगवान की कृपा आती है तो ठहरती नहीं है रुकती नहीं है अपितु चली जाती है ।

अगर जीवन में सत्य , मर्यादा और सेवा न हो तो कृपा ठहरती नहीं ।

निष्कर्ष : कृपा बीज है , पात्रता भूमि है ।

भूमि तैयार हो तो बीज वृक्ष बनता है ।

संस्कार ही वह पात्र हैं , वह बर्तन है जिसमें कृपा स्थिर होती है ।

इसलिए साधना का भी मूल उद्देश्य कृपा मांगना नहीं अपितु पात्र बनना होता है ।

जब पात्रता आ जाती है तो स्वत: काम करने लगती है ।

यह पात्रता किसी बाहरी योग्यता से नहीं बल्कि अंत: करण की शुद्धि , संस्कार और समर्पण से बनती है ।

जब हम श्रद्धा से सुनते हैं , और मनन करते हैं और अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं तब वहीं सत्संग हमें भीतर से बदलने लगता है ।

यह सत्संग शव्दों का आदान-प्रदान नहीं अपितु एक स्मरण है ।

आइए ,हम सब संस्कार से अपने हृदय को तैयार करें और अपने जीवन को श्रद्धा और समर्पण से अपने अंत: करण को पात्र बनाएं ,

हम सबके जीवन में सत्संग , संस्कार , और श्रद्धा के द्वारा वह पात्रता निर्मित होती है ।

पूज्य गुरुदेव भगवान की अहेतु कृपा से ही हम आप सबको सहजता और सरलता से सत्संग का सुअवसर प्राप्त हो पा रहा है आशा है , यह प्रत्येक दिन का सत्संग हमारे आपके और सबके जीवन में भी पात्रता का भाव जागृत करेगा ।

आशा है , सभी भक्तगण एवं शिष्यगण इस विचार को इस "सत्संग को अपने दैनिक जीवन में स्थान देंगे ।

अपने व्यवहारिक जीवन में स्थान दें ।

आज हम सब भक्तगण ने जो सत्संग वार्ता किया है उसका उद्देश्य यही है कि हम अपने हृदय को उस पात्रता से भरें ।

सत्संग केवल व केवल सुनना ही पर्याप्त नहीं है अपितु उसको अपने जीवन में उतारने की भी आवश्यकता है ।

"आज का सत्संग में आप सबने जिस श्रद्धा और मौन से भाग लिया वह स्वयं में एक साधना है आप सबकी उपस्थिति और श्रवण से ही यह वाणी सार्थक हुई ।

आप सभी भक्तगण एवं शिष्यगण को सच्चे हृदय आभार व्यक्त करता हूं ।

आपका मार्गदर्शक आपके पूज्य गुरुदेव ,

[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]

संपूर्ण विश्व ,

संपर्क सूत्र:-6396372583,

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