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एक जिंदा ब्राह्मण या पंडित दस हजार के बराबर होता है: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज

 

एक जिंदा ब्राह्मण या पंडित दस हजार के बराबर होता है: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज

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          "सादर जय सियाराम"

"विद्या विनयसंपन्ने ब्राह्मणे "

एक मरा ब्राह्मण या पंडित तीन आदमी के बराबर होता है ।

और एक जिंदा ब्राह्मण या पंडित दस हजार के बराबर होता है ।

यह कथन ब्राह्मणत्व को पद या शरीर से नहीं अपितु ज्ञान और आचरण से तौलता है ।

"मरा ब्राह्मण" मरा ब्राह्मण वह है 

जो केवल व केवल नाम जनेऊ , कुल या पद से ब्राह्मण है ।

उसके पास शास्त्र , स्वाध्याय , संयम और परोपकार का भाव नहीं है ।

वह परंपरा का शरीर है , आत्मा का नही है ।

का तात्पर्य है उस व्यक्ति से है जो शरीर से ब्राह्मण है , पर ज्ञान , साधना और अपने कर्तव्य से शून्य है ।

ऐसा व्यक्ति समाज के लिए तीन सामान्य लोगों के बराबर ही योगदान देता है ।

क्योंकि उसकी उपस्थिति केवल व केवल औपचारिक है ।

वह परंपरा का स्मरण मात्र है ।

इसलिए तीन लोगों के बराबर होता है ।

प्रभाव का स्तर ,

"जिंदा ब्राह्मण" जिंदा ब्राह्मण 

का तात्पर्य वह है‌ ।

जिंदा ब्राह्मण वह है जो जिसमें ‌ज्ञान , तप , करुणा और लोकसेवा जीवित है ।

उसका शव्द , उसका आचरण , उसकी दृष्टि हजारों को बदल देती है ।

एक ऐसा व्यक्ति समाज के दस हजार लोगों के बराबर होता है ।

क्योंकि वह केवल व केवल जीता नहीं ‌, अपितु दूसरों को भी जीवन देता है ।

जिसके भीतर  जिसके हृदय में वेद , तप , विवेक और लोककल्याण से धड़कता है ।

जिंदा ब्राह्मण  वह है  जिसके  भीतर वेद , तप , विवेक और लोककल्याण का भाव जीवित  है ।

वह अकेला ही समाज को एक नई दिशा दे सकता है ।

वह अकेला ही हजारों को दिशा दे सकता है ।

इसलिए दस हजार के बराबर माना गया है ।

इसका मूल संदेश यह है उपाधि से नहीं , उपासना से व्यक्ति का मोल तय होता है ।

तात्पर्य यह है कि मूल्य बाहरी उपाधि से नहीं अपितु भीतर से तय होता है ।

"विद्या विनयसंपन्ने ब्राह्मणे" विद्या और विनय से युक्त होना ही वास्तविक ब्राह्मणत्व है ।

आपका मार्गदर्शक आपके पूज्य गुरुदेव ,

[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]

संपूर्ण विश्व ,

संपर्क सूत्र:-639632583,

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