सत्संग , श्रद्धा , और समर्पण यही मिट्टी हैं: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज
🙏🙏🌹🌹🌹🙏🙏🌹🌹"सादर जय सियाराम"
🌸"आध्यात्मिक यात्रा"🌸
बीज का खुद को मिट्टी में खो देना ही उसके ने जीवन की शुरुआत है ।
ठीक वैसे ही , हमारा 'पूराना मैं'
अहंकार , आदतें , स्वार्थ जब तक नहीं लगता , तब तक आत्मा का विस्तार नहीं होता ।
नव निर्माण के लिए त्याग बहुत अनिवार्य है ।
सत्संग संस्कार और समर्पण इसी बीज को मिट्टी में डालने की प्रक्रिया है ।
बीज जब मिट्टी में गिरता है तो उसकी बाहरी कठोर खोल फटती है ।
वही खोल उसका 'अस्तित्व' थी
अगर बीज उसे पकड़े रहें तो वह
सड़ जाएगा , वृक्ष नहीं बनेगा ।
हमारे आपके भी जीवन में यही होता है ।
हमारा 'पूराना मैं'
आदतें पूर्वाग्रह , अहंकार एक खोल की तरह है ।
जब तक हम उसे छोड़ने की तरह है जब तक हम उसे छोड़ने को तैयार नहीं होते तब तक एक नई चेतना नहीं उगती ।
सत्संग , श्रद्धा , और समर्पण यही मिट्टी हैं ।
इनमें गिरते ही भीतर का बीज टूटता है ।
और कृपा का अंकुर फूटता है ।
इसलिए नव निर्माण के लिए सबसे पहले त्याग आवश्यक है ।
त्याग के बिना विस्तार नहीं होता है ।
जब हम सत्संग और श्रद्धा की मिट्टी में अपने हृदय को प्रविष्ट करते तो स्वत: कृपा रुपी अंकुर स्वयं फूटता है ।
आपका मार्गदर्शक आपके पूज्य गुरुदेव ,
[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]
🙏🙏🌹🌹🌹🙏🙏🌹🌹
