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“क्या बेरोजगार युवा ‘कॉकरोच’ हैं?” देश के युवाओं, न्यायपालिका और लोकतंत्र पर उठते बड़े सवाल

 “क्या बेरोजगार युवा ‘कॉकरोच’ हैं?”

देश के युवाओं, न्यायपालिका और लोकतंत्र पर उठते बड़े सवाल

लेखक : अधिवक्ता राजेश कुमार

नेशनल ब्यूरो हेड एवं लीगल एडवाइजर

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां संविधान हर नागरिक को अपनी बात रखने, सरकार से सवाल पूछने और अपने अधिकारों की आवाज उठाने की स्वतंत्रता देता है। लेकिन जब देश के सर्वोच्च न्यायिक पदों पर बैठे लोगों के बयान आम युवाओं की भावनाओं को आहत करने लगें, तब सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है।

हाल के दिनों में देश के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत जी के एक कथित बयान को लेकर देशभर में चर्चा तेज हो गई। सुनवाई के दौरान उन्होंने कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग किया, जिसे देश के लाखों बेरोजगार युवाओं ने अपने आत्मसम्मान पर हमला माना। कहा गया कि कुछ बेरोजगार युवा “कॉकरोच” की तरह होते हैं, जो बाद में मीडिया, सोशल मीडिया या आरटीआई एक्टिविस्ट बनकर सिस्टम पर हमला करते हैं।

हालांकि बाद में उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया और उनका आशय केवल फर्जी डिग्री एवं गलत तरीकों से व्यवस्था में प्रवेश करने वालों से था। लेकिन सवाल यह है कि क्या देश के बेरोजगार युवाओं के मन में जो चोट पहुंची, उसका जवाब कौन देगा?

भारत आज बेरोजगारी के गंभीर संकट से गुजर रहा है। लाखों पढ़े-लिखे नौजवान वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। परिवार अपनी जमा-पूंजी लगा देता है। युवा दिन-रात मेहनत करते हैं। लेकिन जब परीक्षाओं के पेपर लीक हो जाते हैं, भर्तियां वर्षों तक अटक जाती हैं, रिजल्ट लंबित रहते हैं और योग्य उम्मीदवार दर-दर भटकते हैं, तब आखिर उनकी गलती क्या है?

क्या सरकार की नीतियों की विफलता का बोझ युवाओं पर डाला जा सकता है?

अगर कोई बेरोजगार युवा नौकरी न मिलने पर सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी आवाज उठाता है, मीडिया में काम करता है, या आरटीआई एक्टिविस्ट बनकर व्यवस्था से सवाल पूछता है, तो क्या वह “परजीवी” हो जाता है? क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध है?

आरटीआई एक्टिविस्ट वही लोग होते हैं जो व्यवस्था में पारदर्शिता चाहते हैं। वे सरकार और संस्थाओं से जानकारी मांगते हैं ताकि भ्रष्टाचार उजागर हो सके। अगर कोई युवा अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाता है, तो उसे अपमानित करना लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचाने जैसा है।

देश के लाखों युवा आज मानसिक दबाव, आर्थिक संकट और भविष्य की अनिश्चितता से जूझ रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार गड़बड़ियां, पेपर लीक और नियुक्तियों में देरी ने उनके आत्मविश्वास को कमजोर किया है। ऐसे समय में अगर देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों की भाषा कठोर और अपमानजनक महसूस हो, तो यह युवाओं के भीतर गहरी निराशा पैदा कर सकती है।

एक और बड़ा सवाल न्यायपालिका की विश्वसनीयता को लेकर भी उठता है। जब न्यायपालिका पर ही भ्रष्टाचार और पक्षपात के आरोप लगते हैं, तब जनता सवाल पूछती है। दिल्ली हाई कोर्ट के एक जज के घर भारी मात्रा में नकदी मिलने की चर्चाओं ने भी लोगों के मन में कई सवाल पैदा किए। यदि ऐसे मामलों पर कार्रवाई को लेकर जनता संतुष्ट नहीं होती, तो स्वाभाविक है कि लोग सोशल मीडिया, मीडिया और आरटीआई के माध्यम से सवाल उठाएंगे।

लेकिन क्या सवाल पूछने वाले लोग देशद्रोही हैं?

क्या वे “कॉकरोच” हैं?

क्या वे इस देश पर बोझ हैं?

नहीं।

वे इसी देश के नागरिक हैं।

वे इसी लोकतंत्र की आवाज हैं।

वे वही युवा हैं जिनके सपनों पर भारत का भविष्य टिका हुआ है।

भारत का युवा वर्ग केवल नौकरी मांगने वाला समूह नहीं है। यही युवा देश की अर्थव्यवस्था, न्याय व्यवस्था, राजनीति, सेना, शिक्षा और तकनीक का भविष्य है। आज जो युवा बेरोजगार है, वही कल एक सफल अधिवक्ता, न्यायाधीश, पत्रकार, अधिकारी या जनप्रतिनिधि बन सकता है।

यह भी सच है कि हर अधिवक्ता को वकालत में तुरंत सफलता नहीं मिलती। हजारों युवा अधिवक्ता वर्षों तक संघर्ष करते हैं। आर्थिक तंगी झेलते हैं। क्या वे भी “परजीवी” कहलाएंगे? अगर कोई युवा संघर्ष कर रहा है, तो उसका मजाक उड़ाना किसी भी संवैधानिक पद की गरिमा के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

देश का संविधान केवल सत्ता में बैठे लोगों को नहीं, बल्कि आम नागरिक को भी सम्मान देता है। लोकतंत्र में आलोचना लोकतंत्र की ताकत होती है, कमजोरी नहीं। यदि सरकार, न्यायपालिका या कोई भी संस्था गलतियां करती है, तो जनता को सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।

आज जरूरत इस बात की है कि देश का हर संवैधानिक पद संवेदनशील भाषा का प्रयोग करे। करोड़ों युवाओं की पीड़ा को समझे। उनकी समस्याओं का समाधान खोजे। क्योंकि बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक संकट भी बन चुकी है।

अगर देश का युवा टूट गया, तो देश का भविष्य भी कमजोर हो जाएगा।

इसलिए युवाओं को अपमानित करने के बजाय उन्हें अवसर, सम्मान और विश्वास देने की जरूरत है। लोकतंत्र में संवाद होना चाहिए, टकराव नहीं। संवेदनशीलता होनी चाहिए, अहंकार नहीं।

भारत का युवा “कॉकरोच” नहीं है।

भारत का युवा इस देश की सबसे बड़ी ताकत है।

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