हर बात जीतने के लिए नहीं अपितु समझने के लिए करों: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज
🙏🙏🌹🌹🌹🙏🙏🌹🌹"सादर जय सियाराम"
"उदासीनवदासीनो गुणैयों न विचाल्यते"
जो उदासीन की तरह रहता है वह कभी विचलित नहीं होता है
"नाहन प्रकाश: सर्वस्य योगमाया समावृत:" 7:25 ,
भगवान गीता में कह रहे हैं कि मैं सबके सामने प्रकट नहीं होता जहां भाव नहीं वहां मैं अपने को छिपा लेता हूं ।
मेरा आभाव ही वहां पर उचित है ।
जहां भाव न मिले वहां रुक जाना इससे तीन दोषों से बचते हैं ।
1- विवाद से क्षय बचते हैं : भाव बिना चर्चा कुतर्क बन जाती है ।
पर जहां सुनने वाला ही न हो वहां बोलना नई बाधा बना देता है ।
2- अपनी भाव की रक्षा होती है :
3- सामने वाले का भी हित होता है :
हम तो केवल व केवल शास्त्र संवत एवं संत-महापुरुषों की वाणी के आधार पर परिसंवाद करता हूं सत्संग करता हूं ।
"तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया" शिष्यवत भाव सबसे पवित्र भाव होता है जो अपने तत्वदर्शी पूज्य गुरुदेव के पास जाकर प्रणाम प्रश्न और सेवा से जाने ।
"भाव का आभाव है जहां संवाद नहीं रुकता जहां संवाद रुकता है ।
वहां संवाद रुकता है वहां भाव का आभाव होता है ।
भाव = हृदय का जुड़ाव + सुनने की इच्छा + सम्मान ,
भाव तर्क नहीं अपितु प्रेम अवश्य होता है ।
भाव में मैं सही -तू गलत नहीं होता है ।
भाव में सत्य की खोज होता है ।
गीता कहती है : श्रद्धावान् रहते ज्ञानम्" 4:39
श्रद्धा= भाव । जहां श्रद्धा है , वहां ज्ञान उतारा है ।
भाव में मौन भी संवाद है ,
भाव जीवित हो तो संवाद नहीं रुकता है ।
भाव हो तो विरह भी बन जाता है ।
संवाद को पूजा बनाओं : हर बात जीतने के लिए नहीं अपितु समझने के लिए करों ।
भाव= तेल , संवाद = दीपक ।
तेल है तो दीपक जलता रहेगा आंधी में भीलौ हिलेगी पर बुझेगी नहीं ।
तेल बीत गया तो दीपक कितना भी सुन्दर हो , बुझ जाएगा ।
संवाद को पूजा बनाओं : यह तो पूरा जीवन बदल देने वाला है ।
पूजा का तात्पर्य है मन वचन कर्म से एकाग्र होकर समर्पण ।
संवाद को पूजा बनाना= हर बातचीत को पवित्र यज्ञ बना देना ।
1- पूजा की तैयारी= संवाद की तैयारी ।
पूजा में संवाद में ।
*स्नान * मन को अहं-क्रोध को धोकर आओं
*आसन * स्थिर बैठो पूरी तरह से उपस्थिति दो ।
*संकल्प * मैं जीतने नहीं समझने आया हूं यह भाव रखो
*दीपक** भाव का दीपक जलाओ , जैसे बिना तैयारी की पूजा जैसे औपचारिक है ।
वैसे ही बिना भाव का संवाद केवल शव्दों का शोर है ।
2-पूजा के पांच अंग = संवाद के पांच अंग ।
1-श्रवण= सुनना
पूजा में घंटा -शंख ध्यान से सुनते हैं ।
संवाद में सामने वाले का दुःख,भय , बात ध्यान से सुनो बीच में मत टोको
2- कीर्तन पूजा = पूजा सत्य स्तुति बोलते हैं ।
संवाद में सत्य , हित , प्रिय बोलों
कटु सत्य भी नहीं , मीठा झूठ भी नहीं -प्रिय सत्य ।
3- स्मरण= ध्यान रखना : पूजा में इष्ट को याद रखते हैं ।
संवाद में याद रखो - सामने वाला भी पुरुषोत्तम का अंश है ।
उसका अपमान , प्रभु का अपमान है ।
4- पादसेवन = सेवा+ भाव पूजा में चरण पखारते हैं ।
संवाद में अहंकार दो दो ।
"मैं ग़लत हो सकता हूं - यह भाव चरण सेवा है ।
5- अर्पण=समर्पण
पूजा में फल फूल चढ़ाते हैं ।
संवाद में अपनै अपना मत चढ़ा दो - शायद आप सही हों कहकर फल अर्पित कर दें ।
सुबह का संकल्प : आज हर संवाद को पूजा बनाऊंगा कम बोलूंगा , ज्यादा सुनूंगा ।
दोपहर का जांच : कितने संवाद में अहं आया ?
रात का अर्पण: हे पुरुषोत्तम , आज जो शव्द-बाण चले हों ।
उन्हें क्षमा करो ।
बातचीत मत करों , आरती करों ।
जब शव्द निकलें तो लगे कि फूल चढ़ रहा हैं ।
जब सुनो तो लगे कि मंत्र सुन रहें हो ।
जब मौन हो तो लगे कि ध्यान लग गया ।
और जिस संवाद के बाद मन हल्का हो जाए , हृदय पवित्र हो जाएं समझो पूजा सफल हो गयी ।
और सबसे बड़ी योग्यता यही है कि हर मिलने वाला पुरुषोत्तम का रुप है ।
आपका मार्गदर्शक आपके पूज्य गुरुदेव ,
[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]
संपूर्ण विश्व ,
संपर्क सूत्र:-6396372583,
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