Etawah News: उपाध्याय श्री 108 विहसंत सागर जी महाराज का जसवंतनगर में भव्य मंगल प्रवेश, जैन समाज ने ढोल-नगाड़ों के साथ किया स्वागत
रिपोर्ट एम एस वर्मा, मनोज कुमार TTN 24 NEWS
जसवंतनगर। उपाध्याय श्री 108 मेडिटेशन गुरु विहसंत सागर जी महाराज दो पीछी सहित का सोमवार प्रातः 8:30 बजे सैमरा से विहार करते हुए जसवंतनगर में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। गुरुदेव की मंगलमय अगवानी के लिए जैन समाज के श्रद्धालु बड़ी संख्या में सैमरा पहुंचे और विहार कराते हुए ढोल-नगाड़ों के साथ उन्हें नगर में लाया गया।गौरतलब है कि विगत 1 मार्च को गुरुदेव आगरा से विहार करते हुए जैतपुरा क्षेत्र उदी मोड़, इटावा के लिए प्रस्थान कर चुके हैं। जैतपुरा में 15 मार्च को प्रस्तावित विहंसत सागर तीर्थधाम के शिलान्यास कार्यक्रम में पहुंचने के लिए उनका पद विहार जारी है। इसी क्रम में सोमवार को वे जसवंतनगर पहुंचे।
नगर पहुंचने पर जैन समाज के श्रद्धालुओं ने ढोल-नगाड़ों के साथ नृत्य करते हुए, पाद प्रक्षालन और आरती कर गुरुदेव की भव्य अगवानी की। इसके पश्चात श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में गुरुदेव के मंगलमय प्रवचन आयोजित हुए।प्रवचन में उपाध्याय श्री ने कहा कि आज पूरी दुनिया में अधिकांश रिश्ते स्वार्थ से जुड़े हुए हैं, लेकिन मुनिराज बिना किसी स्वार्थ के समाज को धर्ममय जीवन जीने की शिक्षा देते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान के दर्शन करते समय अपनी आत्मा का दर्शन करना चाहिए, क्योंकि मानव जीवन बहुत अल्प समय के लिए मिला है। इसलिए दूसरों की कमियों को देखने के बजाय अपने आत्मकल्याण में समय लगाना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि धर्म करने से संकट नहीं आते, बल्कि यह जीवन की परीक्षा होती है। भगवान की भक्ति और गुरु मार्ग पर चलने से साधक समता और शील को धारण करता है। निग्रन्थ साधु समता के प्रतीक होते हैं, वे शत्रुता नहीं बल्कि आत्मशुद्धि का संदेश देते हैं। यही कारण है कि समाज दूर-दूर से मुनिराजों को अपने नगर में आमंत्रित कर समता का पाठ सीखता है।
इस अवसर पर जैतपुरा तीर्थ के लिए जसवंतनगर के 11 श्रेष्ठ दाताओं ने शिला राशि अर्पित की। कार्यक्रम में जैन समाज के अनेक श्रद्धालु एवं गुरु भक्त उपस्थित रहे और सभी ने धर्म लाभ प्राप्त किया।

