लोकेशन बोकारो से TTN 24 National News chanal के विशेष खबर ब्यूरो रिपोर्ट
एंकर। बोकारो रजिस्ट्री कोर्ट में भ्रष्टाचार का अंधेरा: ईमानदार DC साहब के बावजूद आम जनता क्यों त्रस्त? दलालों का अड्डा, चढ़ावा की लूट और सरकारी दस्तावेजों की अनदेखी
बोकारो – झारखंड का औद्योगिक शहर, जहां स्टील प्लांट की चिमनियां धुआं उगलती हैं और विकास की बातें हर मुंह से निकलती हैं। लेकिन यही शहर जब रजिस्ट्री कोर्ट (सब-रजिस्ट्रार कार्यालय) की चौखट पर पहुंचता है, तो आम आदमी का सपना टूट जाता है। शादी का रजिस्ट्रेशन हो, प्रॉपर्टी की खरीद-बिक्री हो या फिर बैंक लोन के लिए सर्टिफाइड कॉपी चाहिए – हर जगह एक ही कहानी: बिना चढ़ावा के काम नहीं चलेगा।एक ईमानदार जिला कलेक्टर (DC) श्री अजय नाथ झा, आईएएस के नेतृत्व में जिला प्रशासन की छवि भले ही साफ-सुथरी हो, लेकिन उनके अधीनस्थ अधिकारी और कर्मचारी पूरी व्यवस्था को दलालों का अड्डा बना चुके हैं। नागरिकों की शिकायतें अब चुप नहीं रह सकतीं। अगर बोकारो के हर पदाधिकारी DC साहब जितने निष्ठावान और ईमानदार हो जाएं, तो शायद यह शहर वाकई खुशहाल बन जाए। लेकिन फिलहाल स्थिति उल्टी है।
मैरिज सर्टिफिकेट: “मैडम साहिबा” का राज और जन्म तिथि का खेल
बोकारो रजिस्ट्री कोर्ट में आजकल एक “मैडम साहिबा” का बोलबाला है, जिन्हें लोग प्रधानमंत्री का दर्जा देते हुए मजाक उड़ाते हैं। शादी के बाद मैरिज सर्टिफिकेट बनवाने जाते हैं तो सबसे पहले जन्म तिथि का प्रमाण मांगा जाता है। सरकारी दस्तावेज PAN कार्ड को वे मानने को तैयार नहीं। जबकि PAN कार्ड भारत सरकार का आधिकारिक दस्तावेज है और देश भर में आयकर विभाग, बैंक, पासपोर्ट कार्यालय इसे डेट ऑफ बर्थ प्रूफ के रूप में स्वीकार करते हैं।
झारखंड सरकार के गाइडलाइंस में भी आयु प्रमाण के रूप में बर्थ सर्टिफिकेट, 10वीं की मार्कशीट या स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट मुख्य हैं, लेकिन कई जगह PAN, आधार या पासपोर्ट भी वैकल्पिक रूप से स्वीकार किए जाते रहे हैं। फिर क्यों बोकारो में PAN को ठुकराया जा रहा है? क्योंकि इससे 60% से ज्यादा लोगों का काम अटक जाता है – खासकर वे जो गरीब हैं, पढ़े-लिखे नहीं हैं या जिनका मैट्रिक सर्टिफिकेट नहीं है।नतीजा? या तो आपका काम महीनों लटकता रहेगा, या फिर चढ़ावा दो। दलाल कोर्ट परिसर में घूमते रहते हैं। वे आपको “सुलझा” देते हैं – 2,000 से 5,000 रुपये में। अगर लड़के-लड़की को विदेश में नौकरी करनी है या पासपोर्ट बनवाना है, तो बिना मैरिज सर्टिफिकेट के काम नहीं चलेगा। लेकिन मैडम साहिबा के राज में बिना रिश्वत के सर्टिफिकेट नहीं मिलता। शादी हो चुकी हो, फिर भी जन्म प्रमाण के अभाव में सर्टिफिकेट रुक जाता है। गरीब परिवार हार मानकर रजिस्ट्रेशन छोड़ देते हैं। क्या यही सरकार की “डिजिटल इंडिया” और “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” की मंशा है?
प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन: 7% सरकारी + 1-2% दलालों का टैक्स
जमीन-मकान की रजिस्ट्री करानी है? सरकारी स्टांप ड्यूटी लगभग 7% है (झारखंड में प्रॉपर्टी वैल्यू के आधार पर)। लेकिन बोकारो रजिस्ट्री कोर्ट में यह सिर्फ शुरुआत है। एक करोड़ की प्रॉपर्टी पर सरकारी राशि के अलावा 1-2% extra दलाल को देना पड़ता है। कुल मिलाकर 80,000 से 2 लाख रुपये का चढ़ावा।
दलालों का नेटवर्क इतना मजबूत है कि हर कर्मचारी उनके साथ मिला हुआ लगता है। बिना उनके “साथ” के फाइल आगे नहीं बढ़ती। रजिस्ट्री ऑफिस में बैठे कर्मचारी खुलेआम कहते हैं – “पैसा कटप्पा काम नहीं होगा”। प्रॉपर्टी की सेल डीड, गिफ्ट डीड, लीज डीड – हर काम में यही सिलसिला। बैंक से लोन लेने के लिए सर्टिफाइड कॉपी चाहिए? सरकारी फीस के अलावा 400-500 रुपये extra चढ़ाओ, तभी मिलेगी।
बैंक लोन के लिए NAC (No Objection Certificate) या पुरानी रजिस्ट्री की कॉपी निकालनी है? सालों के हिसाब से सरकारी पेमेंट तो होगा ही, लेकिन 400-500 रुपये का “चढ़ावा” अनिवार्य। क्या यह सरकारी दस्तावेजों की लूट नहीं है?
डीसी साहब ईमानदार, लेकिन अधीनस्थ “फर्स्ट क्लास” भ्रष्टबोकारो के डीसी श्री अजय नाथ झा, आईएएस की छवि जिले में ईमानदारी की मिसाल के रूप में जानी जाती है। लोग कहते हैं – अगर उनके सभी अधिकारी और कर्मचारी भी उनके जैसा निष्ठावान हो जाएं, तो बोकारो वाकई बदल सकता है। लेकिन फिलहाल स्थिति उल्टी है। रजिस्ट्री कोर्ट में “बाहरी कर्मचारी” और दलालों का राज चल रहा है।
पहले भी कई शादियों में PAN कार्ड को आयु प्रमाण के रूप में माना गया था। लेकिन “मैडम साहिबा” के आने के बाद लूट मच गई है। कोर्ट परिसर दलालों का अड्डा बन चुका है। हर कर्मचारी पैसे के लिए तैनात। गरीब किसान अपनी जमीन बेचने या खरीदने भी नहीं जा पाता। बेटी-बेटे की शादी का रजिस्ट्रेशन भी अधर में लटक जाता है।
क्या सरकार, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो और झारखंड हाईकोर्ट सोए हैं?
यह सवाल हर बोकारो वासी पूछ रहा है:
क्या सरकार इस रजिस्ट्री कोर्ट पर नजर रखती है?
क्या एंटी करप्शन ब्यूरो (Vigilance) ने कभी छापा मारा या जांच की?
क्या झारखंड हाईकोर्ट स्वतः संज्ञान लेकर इस भ्रष्टाचार को रोकेगा?
बोकारो में हाल ही में फॉरेस्ट लैंड स्कैम (103 एकड़ जमीन की फर्जी बिक्री) सामने आया, जिसमें ED और CID ने छापे मारे और गिरफ्तारियां हुईं। लेकिन रोजमर्रा का छोटा-मोटा भ्रष्टाचार – जो आम आदमी को चींटी की तरह काट रहा है – पर कोई ध्यान नहीं।
समाधान क्या हो सकता है?
डिजिटल रजिस्ट्रेशन: पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन, बिना किसी कर्मचारी के संपर्क के। जैसे अन्य राज्यों में हो रहा है।
PAN कार्ड को मान्यता: आयु प्रमाण के रूप में स्पष्ट गाइडलाइन जारी करें।
कैमरा और CCTV: हर काउंटर पर रिकॉर्डिंग, शिकायत बॉक्स।
दलालों पर सख्ती: कोर्ट परिसर से दलालों को हटाओ, सख्त सजा दो।
डीसी साहब का हस्तक्षेप: स्वयं रजिस्ट्री कोर्ट का निरीक्षण करें, ईमानदार कर्मचारियों को पुरस्कृत करें और भ्रष्ट को सस्पेंड।
हाईकोर्ट का रोल: पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) या स्वतः संज्ञान लेकर जांच समिति गठित करें।
बोकारो रजिस्ट्री कोर्ट को बंद करने की बात नहीं, बल्कि इसे सुधारने की जरूरत है। गांधी-नेहरू ने जिस भारत का सपना देखा था – भ्रष्टाचार मुक्त, गरीबों का हित साधने वाला – वह यहीं से शुरू होना चाहिए।
अगर बोकारो के डीसी साहब इस पर उचित कार्रवाई करें, तो न सिर्फ बोकारो बल्कि पूरे झारखंड को एक सबक मिलेगा। आम लोग अपनी बेटी-बेटे की शादी रजिस्टर्ड करा सकें, जमीन की खरीद-बिक्री बिना डर के कर सकें और बैंक के काम बिना चढ़ावे के हो सकें।
बोकारो वासी अब चुप नहीं रहेंगे।
यह लेख उन हजारों पीड़ित परिवारों की आवाज है जो रोज रजिस्ट्री कोर्ट के बाहर इंतजार करते हैं। सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका – अब समय आ गया है कि आप इस अंधेरे को रोशनी से बदल दें।
बोकारो बदल सकता है। बस इच्छाशक्ति चाहिए।
जय हिंद! जय झारखंड!
(यह लेख बोकारो के नागरिकों द्वारा उठाई गई शिकायतों और सूत्रों से मिली जानकारी पर आधारित है। यदि आप भी पीड़ित हैं, तो डीसी कार्यालय, विजिलेंस या हाईकोर्ट में शिकायत दर्ज कराएं। बदलाव की शुरुआत आपसे ही होगी।)
