ईश्वर ने इस संसार को बड़ी खुबसूरती से रचा है: आपका मार्गदर्शक आपके पूज्य गुरुदेव, आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज
🙏🙏🌹🌹🌹🙏🙏🌹🌹"सादर जय सियाराम"
श्रीभगवान उवाच ।
संन्यास: (सन्त:)कर्मयोगश्र्च नि:श्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ।।
संन्यास अर्थात कर्मों का परित्याग और कर्मयोग उनका अनुष्ठान करना ये दोनों ही कल्याणकारक हैं ।
अथवा दोनों मुक्ति देने वाले हैं ।
यद्यपि ज्ञान की उत्पत्ति में हेतु होने से ये दोनों ही कल्याणकारक हैं ।
तथापि कल्याण के उन दोनों कारणों में ज्ञान रहित केवल संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है ।
वास्तव में कर्म योगी वह व्यक्ति हैं जो अपने आध्यात्मिक और सामाजिक दोनों दायित्वों को पूरा करता है ।
कर्म संन्यास उन उत्तम आत्माओं के लिए है ।
जिन्होंने देह-विहीन अवस्था को पार कर लिया है ।
कर्म संन्यासी वह व्यक्ति हैं ।
जो ईश्वर से पूरा लीन होकर अपने सामाजिक कर्तव्यों का त्याग कर स्वयं को पूरी तरह से आध्यात्मिक साधनाओं और ईश्वर की भक्ति में अपने आपको समर्पित कर देता हैं ।
भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि संन्यास की तुलना में कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं ।
और अर्जुन को इसे ही श्रेष्ठ मार्ग बताते हैं
इसका कारण यह है कि कर्म संन्यासी के लिए जोखिम का सामना करना पड़ा है ।
यदि वे अपने कर्तव्यों का त्याग तो कर ले , लेकिन अपना मन पूरी तरह ईश्वर में लीन न कर पायें तो अंततः उन्होंने न तो संसारिक सफलता प्राप्त होती है न ही आध्यात्मिक संतुष्टि , कर्मयोगी अपने संसारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए आंतरिक रूप से अनासक्ति का अभ्यास करते हैं ।
परिणाम स्वरूप वे साकारात्मक और नाकारात्मक दोनों परिणामों को समभाव से स्वीकार करते हैं
उन्हें ईश्वर की कृपा मानते हैं ।
ईश्वर ने इस संसार को बड़ी खुबसूरती से रचा है ।
ताकि हमें सुख और दुःख दोनों के अनुभव प्राप्त हों और हम धीरे-धीरे आध्यात्मिक रूप से विकसित हो सकें अपने नियमित जीवन को जीते हुए हर परिस्थिति को सहन करते हुए और अपने कर्तव्यों को प्रसन्नता पूर्वक निर्वाह करते हुए संसार हमें स्वभाविक रुप से आध्यात्मिक विकास की ओर अग्रसर करता है ।
आपका मार्गदर्शक आपके पूज्य गुरुदेव ,
[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]
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संपर्क सूत्र:-6396372583,
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