सोमनाथ आध्यात्मिक, सांस्कृतिक चिंतन और राष्ट्रीय स्मरण का केंद्र: सम्राट चौधरी
मुकेश कुमार-स्टेट हेड-बिहार/झारखंड
पटना(बिहार)।सोमनाथ मंदिर पर हुए आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे होने के अवसर पर अपने गौरवशाली इतिहास,आस्था और आत्मसम्मान को याद करते हुए 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व-2026' के तहत एक राष्ट्रीय अभियान के तहत आज पटना स्थित खाजपुरा शिव मंदिर में भव्य दीपोत्सव का आयोजन किया गया।इस कार्यक्रम में बिहार के उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी शामिल हुए।सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के पावन अवसर पर आयोजित खाजपुरा शिव मंदिर कार्यक्रम में पहुंचने के बाद उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पूजा अर्चना की और दीप प्रज्वलित कर महादेव से बिहारवासियों के सुख, समृद्धि की कामना की।उन्होंने इस मौके पर कहा कि 1000 वर्ष पूर्व बर्बर आक्रांता मुहम्मद गजनी ने पवित्र सोमनाथ मंदिर के विध्वंस का कुत्सित प्रयास किया था।आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रखर नेतृत्व में उसी गौरवशाली इतिहास को 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' के रूप में देशभर में मनाया जा रहा है।इस मौके पर खाजपुरा शिव मंदिर परिसर में भव्य दीपोत्सव में 1000 दीप प्रज्वलित किए गए।दीपोत्सव कार्यक्रम श्री श्री महाशिवरात्रि महोत्सव शोभा यात्रा अभिनंदन समिति के संरक्षक और विधायक डॉ.संजीव चौरसिया के नेतृत्व में आयोजित किया गया।इस मौके पर बिहार भाजपा के संगठन महामंत्री भीखूभाई दालसनिया सहित बड़ी संख्या में भाजपा के कार्यकर्ता और आम लोग उपस्थित थे।कार्यकम के दौरान खाजपुरा शिव मंदिर परिसर को पूरी तरह सजाया जाएगा और 1000 दीपों की रोशनी से पूरा परिसर जगमगाएगा, जिससे एक दिव्य और धार्मिक माहौल का अनुभव हुआ।
उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने आगे कहा कि इस आयोजन की परिकल्पना विनाश के स्मरण के रूप में नहीं,बल्कि सहनशीलता, विश्वास और सभ्यतागत आत्म-सम्मान को श्रद्धांजलि के रूप में की गई है।सदियों से,सोमनाथ को बार-बार उन आक्रमणकारियों द्वारा निशाना बनाया गया जिनका उद्देश्य भक्ति के बजाय विनाश था।हालांकि,हर बार भक्तों के सामूहिक संकल्प के माध्यम से मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया। पुनरुद्धार के इस अटूट चक्र ने सोमनाथ को भारत की सभ्यतागत निरंतरता का एक शक्तिशाली प्रतीक बना दिया।आज सोमनाथ आध्यात्मिक,सांस्कृतिक चिंतन और राष्ट्रीय स्मरण के केंद्र में परिवर्तित हो गया है।
उन्होंने कहा कि यह पर्व भारत के उन वीरों की स्मृति में मनाया जा रहा है, जिन्होंने मंदिर की रक्षा के लिए बलिदान दिया और जो आने वाली पीढ़ियों की सांस्कृतिक चेतना को प्रेरित करते रहेंगे।

