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पॉक्सो कोर्ट ने कलयुगी पिता और उसके साथी को बेटी के साथ दुष्कर्म के मामले में सुनाई ताउम्र कैद

 लोकेशन बोकारो:से नेशनल हेड एवं लीगल एडवाइजर अधिवक्ता राजेश कुमार की विशेष रिपोर्ट।      

 एंकर।   पॉक्सो कोर्ट ने कलयुगी पिता और उसके साथी को बेटी के साथ दुष्कर्म के मामले में सुनाई ताउम्र कैद

बोकारो, 23 जनवरी 2026 — झारखंड के बोकारो जिले की विशेष पॉक्सो अदालत ने एक बेहद संवेदनशील और रिश्तों को शर्मसार करने वाले मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। विशेष न्यायाधीश देवेश कुमार त्रिपाठी की अदालत ने अपनी ही 11 वर्षीय नाबालिग बेटी के साथ बार-बार दुष्कर्म करने वाले पिता और उसके एक सहयोगी मित्र को दोषी करार देते हुए ताउम्र कैद (आजीवन कारावास) की सजा सुनाई है।

यह जघन्य अपराध मार्च 2025 में हुआ था, जब पीड़िता मात्र 11 वर्ष की थी। मामले की शुरुआत पीड़िता की मां द्वारा बालीडीह थाना में दर्ज कराई गई प्राथमिकी से हुई, जिसमें उन्होंने अपने पति और उसके मित्र पर बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया था। मां ने अदालत को बताया कि वह अपने पति पर भरोसा करती थीं, लेकिन उसने ही अपनी बेटी के साथ इस घिनौने अपराध को अंजाम दिया।

विशेष लोक अभियोजक रविशंकर चौधरी के अनुसार, अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए फोरेंसिक साइंस रिपोर्ट, सीसीटीवी फुटेज और अन्य प्रमाणिक साक्ष्यों के आधार पर दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया। POCSO एक्ट की धारा 4 के तहत दोनों को 25 वर्ष की कठोर कारावास और 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया, जबकि धारा 6 (अगग्रवेटेड पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट) के तहत आजीवन कारावास और 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी। जुर्माना न चुकाने पर अतिरिक्त तीन वर्ष की कठोर कारावास होगी।

यह फैसला न केवल पीड़िता को न्याय दिलाने वाला है, बल्कि समाज में ऐसी घटनाओं के खिलाफ एक मजबूत संदेश भी देता है। विशेष न्यायाधीश देवेश कुमार त्रिपाठी ने कहा कि बच्चे सबसे कमजोर वर्ग हैं और उनके साथ होने वाले अपराधों में किसी भी प्रकार की नरमी बरतने की गुंजाइश नहीं है।

यह मामला समाज में पितृसत्ता के दुरुपयोग और बच्चों की सुरक्षा की जरूरत को एक बार फिर उजागर करता है। पीड़िता को अब बेहतर परामर्श और पुनर्वास की आवश्यकता है, ताकि वह इस सदमे से उबर सके। बोकारो पुलिस और अदालत की त्वरित कार्रवाई सराहनीय है, जिससे नौ महीने के भीतर ही दोषियों को सजा सुनाई गई।

ऐसे अपराधों के खिलाफ सख्त कानून और समाज की जागरूकता ही बच्चों को सुरक्षित रख सकती है।

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