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ग शिष्य के कर्म को बदल देते है: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज


गुरुदेव शिष्य के कर्म को बदल देते है: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज

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        "सादर जय सियाराम"

आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज का एक अत्यंत मार्मिक और हृदय- स्पर्शी सूत्रों आपसे साझा कर रहा हूं , जो वास्तव में गुरु-शिष्य परंपरा की आत्मा को उजागर करता है ।

गुरुदेव का दिव्य वचन एवं ‌विस्तार भाव :

1-सद्गुरु का नि:स्वार्थ संकल्प :

गुरुदेव का हृदय हर एक क्षण एक ही प्रार्थना करता है ।

"चाहे मुझे भगवतप्राप्ति न हो पर मेरे शिष्य को भगवतप्राप्ति अवश्य होनी चाहिए ।"

क्यों ?

क्योंकि गुरु दीपक है- स्वयं जलकर शिष्य के जीवन में प्रकाश भर देता है ।

गुरु का अपना कोई स्वार्थ नहीं होता है ।

इतिहास साक्षी हैं :

समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी को क्षत्रपति बना दिया , स्वयं फटी गुदड़ी में जीवन बिताया ।

रामकृष्ण परमहंस जी कैंसर की पीड़ा सहते रहे ,पर चिंता नरेंद्र की करते रहे-कि वो विवेकानंद कैसे बने ।

गुरु का परम आनू इसी में है ।

"मेरा शिष्य मुझसे भी आगे निकल जाए ।"

दूसरा रिश्ता है मां का ।

मां भी प्राण देकर बच्चे का भला चाहती है ।

खुद भूखी सो जाएगी , पर पर अपने बच्चे को भूखा नहीं बुलाएगी ।

खुद फटे वस्त्र पहनेगी ,पर पर अपने बच्चे को नया वस्त्र पहनाएगी ।

इसलिए शास्त्र उद्धोष करते हैं- गुरु और माता , भगवान , से भी पहले पूज्य हैं ।

क्योंकि भगवान कर्म फल देते हैं  

पर गुरुदेव शिष्य के कर्म को बदल देते है ।

और मां बिना कर्म देखें ही आशिर्वाद दे देती है ।

3-आचार्य जी का हृदय-भेदी सूतरे "गुरु-शिष्य का हाथ तब भी नहीं छोड़ता ,जब शिष्य गुरु का हाथ छोड़ देता है ।

गुरु की दृष्टि सदा अपने शिष्य के पीठ पर रहती है -कहीं गिर न जाए , संभाल लूं ।"

"संसार पिता कहता है-मेरा बेटा बड़ा आदमी बने ।

और गुरुदेव कहते है-मेरा शिष्य बड़ा भक्त बने ।"

"निष्कर्ष एवं निवेदन"

जिसके जीवन में सच्चा सद्गुरु मिल गया , समझो उसका बेड़ा पार हो गया ।

गुरुदेव की कृपा एक कृपा-दृष्टि शिष्य के करोड़ों जन्मों के पाप भस्म कर देती है ।

गुरु देह छोड़कर भी नहीं मरता-गुरुदेव सदा अपने शिष्य के हृदय में जीवित रहते हैं ।

आप सभी भक्तगण करबद्ध प्रार्थना - इस सत्संग को अपने परिवार , मित्रों और विशेषकर युवा पीढ़ी तक पहुंचाएं ताकि युवा पीढ़ी भी पूर्णतः लाभ ले सकते ।

गुरु केवल व केवल एक व्यक्ति नहीं अपितु गुरु एक तत्व है- जो हमें 'मै , से 'वह' तक की यात्रा कराता है ।

यही पर वाणी का विराम ।

सादर जय सियाराम ,

[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]

संपर्क सूत्र:-6396372583,

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