जब मन की दिशा मुड़कर भगवान की ओर होगी , तब मुक्ति का द्वार खुलेगा:आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज
"सादर जय सियाराम"
आशा करता हूं कि सभी भक्तगण एवं शिष्यगण प्रभु की कृपा और पूज्य गुरुदेव भगवान के आशीर्वाद से आप सपरिवार प्रसन्न होंगे ।
आज एक अत्यंत गूढ़ और जीवन-परिवर्तनकारी सूत्र आपके समक्ष रखता हूं ।
"Direction नहीं , Dimension"
1-Direction=दिशा बदलना -बाहरु परिवर्तन ,
दिशा बदलना तात्पर्य है : गलत काम को छोड़कर सही काम अपना लेना ।
दृष्टांत -झूठ छोड़कर सच बोलना , निंदा छोड़कर भजन करना , चोरी छोड़कर मेहनत करना ।
यह आवश्यक है , पर यह केवल व केवल बाहरी सुधार है ।
समाज इसे देखता है, ताली बजाता है ।
पर मन का स्तर वही रहता है ।
2-Dimension= आयाम बदलना -भीतर का परिवर्तन , आयाम बदलना तात्पर्य है : चेतना का स्तर उठना , दृष्टि बदलना ।
जब हर व्यक्ति को भगवत भाव से देखें जब व्यक्ति को हर एक प्राणी में सीताराम दिखने लग जाएं हर एक परिस्थिति में गुरुदेव की कृपा दिखने लग जाएं हर एक परिस्थिति में गुरुदेव की मर्जी दिखने लग जाएं ।
लाभ-हानि में सम रह जाए
-तब समझो उसका आयाम बदल गया ।
यह परिवर्तन भीतर का है ।
इसे संसार नहीं , परमात्मा देखता है ।
3-एक सरल दृष्टांत से समझें एक व्यक्ति ने शराब छोड़ दी और मंदिर जाने लगा-उसने Direction बदली , बहुत अच्छी बात है ।
पर यदि मंदिर जाकर भी मन में व्यापार का हिसाब चलता है ।
दूसरे की तुलना चलती है, तो Dimension नहीं बदली ।
वहीं दूसरा व्यक्ति दुकान पर बैठा है पर ग्राहक ऊ राम-रुप मानकर सेवा कर रहा है ।
नफा-नुकसान से विचलित नहीं होता-तो उसकी Dimension बदल गई ।
वह कर्म करते हुए भी योगी है ।
4-आचार्य का सार-तत्व ,
"केवल मूर्ति की दिशा में माथा टेकने से मुक्ति नहीं मिलेगी ,
जब मन की दिशा मुड़कर भगवान की ओर होगी , तब मुक्ति का द्वार खुलेगा ।"
Direction बदलने से -आप संसारी से धार्मिक बनते हैं ।
Dimension बदलने से- आप धार्मिक से आध्यात्मिक बनते हैं ।
और वहीं से परमात्मा की प्राप्ति होती है ।
बाहर की यात्रा किलोमीटर में नापी जाती है ।
और भीतर की यात्रा संस्कारों से नापी जाती है ।
आज की युवा पीढ़ी Direction तो बदल रही है , पर Dimension बदलना भूल रही है ।
[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]
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