लोकेशन बोकारो से नेशनल हेड एवं लीगल एडवाइजर अधिवक्ता राजेश कुमार की कलम से
एंकर। बोकारो चास अनुमंडल में अधिवक्ताओं की दयनीय स्थिति: अपनों की बेवफाई और प्रशासन की उदासीनता
परिचय: एक दर्दनाक सच्चाई"गैरों में कहाँ दम था, यहाँ तो अपनों ने ही हमें तोड़ दिया।" यह शब्द न केवल एक कविता की पंक्ति की तरह गूंजते हैं, बल्कि बोकारो जिले के चास अनुमंडल में बैठने वाले अधिवक्ताओं की पीड़ा को बयान करते हैं। ये वे अधिवक्ता हैं जो न्याय की मंदिर को सजाते हैं, जिनकी मेहनत से कोर्ट की शोभा बढ़ती है, लेकिन आज वे खुद अपनी जगह के लिए तरस रहे हैं। अनुमंडल अधिकारी से लेकर जिला प्रशासन तक, सभी की उदासीनता ने उन्हें अकेला छोड़ दिया है। और सबसे दुखद बात यह है कि उनके अपने – बोकारो बार एसोसिएशन के पदाधिकारी – भी उनके साथ नहीं खड़े। क्या न्याय के रखवाले खुद अन्याय के शिकार हो सकते हैं? यह सवाल आज बोकारो की अदालतों में गूंज रहा है, और इसे अनसुना नहीं किया जा सकता।
अधिवक्ताओं की समस्या: बैठने की जगह का अभावचास अनुमंडल कोर्ट में अधिवक्ताओं के लिए बैठने की उचित व्यवस्था नहीं है। वे जो दिन-रात मुकदमों की तैयारी करते हैं, क्लाइंट्स से मिलते हैं, और न्याय प्रक्रिया को सुचारू रखते हैं, उन्हें कहा जाता है – "अपना-अपना जगह देख लो।" क्या यह न्याय है? क्या यह सम्मान है? कोर्ट परिसर में एक ऐसा स्थान बनाया गया है जहाँ अधिवक्ता बैठ सकें, लेकिन वहाँ की जमीन पर मिट्टी डाली गई है। गर्मी के मौसम में जब लू चलेगी, तो वह तपती धूप और लू अधिवक्ताओं को झुलसा देगी। क्या वे वहाँ बैठकर दीपक जला पाएंगे? क्या वे अपनी फाइलें संभाल पाएंगे?
और बारिश का मौसम तो और भी भयावह है। जब पानी बरसेगा, तो वह सारा पानी अधिवक्ताओं की कुर्सियों और टेबलों पर गिरेगा। फाइलें भीगेंगी, किताबें खराब होंगी, और अधिवक्ता खुद भीगते हुए काम करेंगे। क्या यह स्थिति एक सभ्य समाज में स्वीकार्य है? अधिवक्ता संघ ने शायद एक करकट लोहे का शेड बनवा दिया, लेकिन क्या इससे समस्या हल हो गई? नहीं, यह तो महज एक दिखावा है। समस्या की जड़ गहरी है – फंड की कमी, प्रशासन की अनदेखी, और अपनों की बेवफाई।
अपनों की बेवफाई: बार एसोसिएशन की भूमिकासबसे ज्यादा दर्द तब होता है जब अपनों से धोखा मिले। बोकारो बार एसोसिएशन के पदाधिकारी, जो अधिवक्ताओं के हितों की रक्षा करने के लिए चुने गए हैं, वे ही आज चुप हैं। क्या वे अधिवक्ताओं की पीड़ा नहीं देखते? क्या वे अनुमंडल अधिकारी से बात नहीं कर सकते? अधिवक्ता संघ के पास फंड की कमी है, यह सही है, लेकिन क्या वे आवाज नहीं उठा सकते? क्या वे जिला प्रशासन से मांग नहीं कर सकते? अधिवक्ता संघ को चाहिए कि वे अपने सदस्यों के लिए लड़ें, न कि उन्हें अकेला छोड़ दें। अगर अपनों ने ही पीठ दिखा दी, तो गैरों – जैसे अनुमंडल अधिकारी – से क्या उम्मीद की जाए? वे तो गैर हैं, लेकिन अपनों की जिम्मेदारी तो बनती है।
प्रशासन की उदासीनता: डीसी और एसडीओ की जिम्मेदारी
माननीय जिला अधिकारी (डीसी) साहब और अनुमंडल अधिकारी (एसडीओ) को इस स्थिति पर शर्म आनी चाहिए। वे सरकार के प्रतिनिधि हैं, उनके पास पैसा है, संसाधन हैं। वे बड़े-बड़े भवन बना सकते हैं, लेकिन अधिवक्ताओं के लिए एक साधारण शेड या बैठने की जगह क्यों नहीं? कोर्ट की शोभा अधिवक्ताओं से ही बढ़ती है। अगर वे ही असुविधा में होंगे, तो न्याय प्रक्रिया कैसे सुचारू रहेगी? डीसी साहब को चाहिए कि वे इस मुद्दे पर ध्यान दें। अधिवक्ताओं की समस्याओं को सुनें, और तत्काल समाधान निकालें। क्या वे नहीं जानते कि अधिवक्ता समाज के महत्वपूर्ण हिस्से हैं? क्या वे नहीं देखते कि ये अधिवक्ता गरीबों, कमजोरों के लिए लड़ते हैं?
प्रशासन की यह उदासीनता न केवल अधिवक्ताओं को प्रभावित करती है, बल्कि पूरे न्याय तंत्र को कमजोर करती है। अगर अधिवक्ता आराम से काम नहीं कर पाएंगे, तो मुकदमे लंबित होंगे, न्याय में देरी होगी, और आम आदमी प्रभावित होगा। क्या यही है हमारा प्रशासनिक ढांचा?
क्या हो समाधान?यह समय है जागने का। अधिवक्ताओं को अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए। बोकारो बार एसोसिएशन को एकजुट होकर प्रशासन से मांग करनी चाहिए। डीसी और एसडीओ को पत्र लिखें, मीटिंग आयोजित करें, और मीडिया के माध्यम से अपनी पीड़ा व्यक्त करें। सरकार के पास फंड है, वे एक स्थायी भवन बना सकते हैं – जहां छत हो, दीवारें हों, और मौसम की मार से बचाव हो। अधिवक्ता संघ को भी अपने फंड का बेहतर उपयोग करना चाहिए। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है – एकता। अगर अपनों ने साथ दिया, तो गैरों की क्या औकात?
समाज को भी सोचना चाहिए। अधिवक्ता हमारे अधिकारों के रक्षक हैं। अगर वे ही असुरक्षित हैं, तो हमारा क्या होगा? बोकारो की जनता को इस मुद्दे पर आवाज उठानी चाहिए। मीडिया को इस पर रिपोर्ट करनी चाहिए। तभी बदलाव आएगा।
निष्कर्ष: न्याय के लिए न्याय की मांग
बोकारो चास अनुमंडल के अधिवक्ताओं की यह पीड़ा एक चेतावनी है। अगर हम अपनों की बेवफाई और प्रशासन की उदासीनता को सहते रहे, तो न्याय का मंदिर ध्वस्त हो जाएगा। माननीय डीसी साहब, एसडीओ साहब, और बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों – जागिए! अधिवक्ताओं को उनका हक दीजिए। उन्हें जगह दीजिए, सम्मान दीजिए। क्योंकि अगर वे टूट गए, तो पूरा तंत्र टूट जाएगा। "अपनों ने ही हमें तोड़ दिया" – यह शब्द न केवल दर्द है, बल्कि एक चुनौती भी। क्या हम इस चुनौती को स्वीकार करेंगे?
यह लेख बोकारो के अधिवक्ताओं की आवाज है



