दान अहंकार मिटाकर सेवा की भावना को प्रबल करता है: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज
🙏🙏🌹🌹🌹🙏🙏🌹🌹"सादर जय सियाराम"
प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुं एक प्रधान ।
जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान ।।
धर्म के चार चरण (सत्य , दया , तप , और दान )
प्रसिद्ध है ।
जिनमें से कलि में एक (दान रुपी)चरण ही प्रधान है ।
जिस किसी भी प्रकार से भी दिए जाने पर दान कल्याण ही करता है ।
कलयुग में दान ही कल्याण का मुख्य साधन है ।
निस्वार्थ भाव से दिया गया दान न केवल लेने वाले की सहायता करता है ।
बल्कि देने वाले के अहंकार को मिटाकर मानसिक शांति और पुण्य प्रदान करता है ।
दान लेने वाला बड़ा है क्योंकि वह हमें दान की सेवा का अवसर देकर मौका देकर हमारा कल्याण करता है ।
शास्त्रों में धन की तीन गति बताई गई है ।
दान , भोग और नाश दान सर्वोत्तम गति है ।
श्रेष्ठ दान सही समय , सही पात्र (जरुरतमंद)
और श्रद्धा से किया गया दान सात्विक माना गया है ।
मानसिक शांति भूखे को भोजन प्यासे का पानी , और जरुरतमंदों की सहायता देना जीवन में बड़ा बदलाव लाता है और आंतरिक तृप्ति प्रदान करता है ।
दान अहंकार मिटाकर सेवा की भावना को प्रबल करता है ।
अक्सर हम लोग दान करते है व अनुभव करते हैं कि हमने दान लेने वाले का कल्याण किया यह हमारे अंदर एक अहंकार का भाव उत्पन्न हो जाता है ।
दान लेने वाला हमसे बड़ा होता हैं ।
क्योंकि वह हमारा दान स्वीकार कर हमें सेवा का अवसर प्रदान करता है ।
और साथ ही हमारा कल्याण करता है ।
दान देने वाले में महाराज शिबी बलि कर्ण दधिचि प्रमुख हैं ।
जिन्होंने दान देकर एक उदाहरण प्रस्तुत किए हैं ।
महर्षि दधीचि जी ने देवताओं की प्रार्थना पर अपना देह त्याग कर केवल अपनी हड्डियां दान करने हेतु कर दिया था ।
दान सदा मंगल करता है ।
आपका मार्गदर्शक आपके पूज्य गुरुदेव ,
[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]
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संपर्क सूत्र:-6396372583,
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