नर से नारायण तक की यात्रा भी स्वयं पुरुषोत्तम राम ही है: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज
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गुजरात प्रदेश
🙏🙏🌹🌹🌹🙏🙏🌹🌹"सादर जय सियाराम"
🌹"आध्यात्मिक यात्रा"🌹
"रामों विग्रहवान धर्म: रामो ज्ञानं परं तप: ।
रामो ब्रह्मभिधानोऽसो रामेणेव हिं लोक:।।"
चेतना के अनुरूप अगर देख जाय तो राम नाम के चार अर्थ है
अर्थात : समस्त संसार में जो चलायमान बन के व्याप्त है ।
वहीं पुरुषोत्तम राम है ।
जो कण-कण में रमे हुए हैं ।
पेड़ , पर्वत , नदी , आकाश , देह और प्राण इनमें प्रवाहित होने वाली ऊर्जा स्वयं पुरुषोत्तम राम भी है ।
इसीलिए आप उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भी कहते हैं ।
पुरुषोत्तम भी कहते हैं ।
क्योंकि प्रकृति तब तक अपनी मर्यादा त्याग नहीं करती , जब तक अनिवार्य न हों और आपको जब भी प्रकृति ने अपने मर्यादा का त्याग किया है ।
तब परिणाम विनाशकारी ही रही है ।
पुरुषोत्तम राम ही जन्म हैं ।
पुरुषोत्तम राम ही मृत्यु है ।
पुरुषोत्तम राम ही मन है और
पुरुषोत्तम राम ही माया है ।
माया का त्याग करों पुरुषोत्तम राम का दूसरा अर्थ ज्ञानं परं तप:
अर्थात जो ज्ञान माया से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है वो
पुरुषोत्तम राम ही है ।
पुरुषोत्तम राम ही परम तप है ।
और मन द्वारा की गई साधना भी पुरुषोत्तम राम ही है , पुरुषोत्तम राम ही योग है , पुरुषोत्तम राम ही ध्यान है , नर से नारायण तक की यात्रा भी स्वयं पुरुषोत्तम राम ही है ।
पुरुषोत्तम राम ही तो नारायण है
पुरुषोत्तम राम का तीसरा अर्थ ,
ब्रह्म विधान पुरुषोत्तम राम ही ब्रह्म है , पुरुषोत्तम राम ही परमात्मा है ।
जिससे हर जीव मुक्ति उपरांत
विलीन होने का कामना करता है
पुरुषोत्तम राम से ही जीव की यात्रा आरंभ करता है ,
और पुरुषोत्तम राम में ही पूर्ण होती हैं ।
"राम: विग्रहवान धर्म:"
पुरुषोत्तम राम परम रचयिता हैं ।
और रचनाकार को प्रकृति रचना करती हैं ।
और जो रच गया है ,उसका अंत भी तय है ।
रचना और विनाश का ये क्रम निरंतर चलता आया है ।
और चलता ही रहेगा , और यही धर्म है ।
और धर्म ही स्वयं पुरुषोत्तम श्रीराम हैं ।
आपका मार्गदर्शक आपके पूज्य गुरुदेव ,
[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]
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