रिपोर्ट भरतसिंह आर ठाकोर अरवल्ली गुजरात
ब्यूरो रिपोर्ट TTN 24 News
*स्त्री शक्ति कि मिशाल - सीमा कुशवाहा*
एक लड़की की इज्जत उसका सबसे कीमती गहेना होता है। एक लड़की चाहे तो कुछ भी कर सकती है। इसको कभी कम मत समझना। वो एक बार जो थान ले उसके बाद, वो कौन से परिवार से है, कहा से आ रही है, क्या कर रही है। कुछ मायने नहीं रखता। आज हम एसी ही एक स्त्री के बारे में बात करेंगे। जो उत्तर प्रदेश के राज्य સે इटावा उगरपुर गांव से है। उसका जन्म एक रूढ़िचुस्त घरमे हुआ था। जिसका नाम है सीमा कुशवाहा। जब इसका जन्म हुआ तब उसे मार डालने का सोचा गया था। क्योंकि वह एक बेटी थी।उस दिन उसे अपने पापा और बुआ ने बचा लिया था। अगर इस दिन सीमा कुशवाहा को मार दिया होता तो बाकी लड़कियों के लिए वह कभी लड़ नहीं पाती। वह जिस जगह से आ रही है वहां लड़कियों को पढ़ने की इजाजत नहीं थी। क्योंकि वहां की लड़कियों को अगर बाहर पढ़ने के लिए भेजा गया तो उसके परिवार वालों के साथ न जाने क्या क्या होता।
लेकिन सीमा कुशवाहा के पिताजी जो गांव के मुखिया थे, वह सीमा को पढाना चाहते थे, लेकिन उन्हें सीमा की सुरक्षा का डर भी था। फिर भी उन्होंने सीमा को पढ़ने के लिए भेजा। आठ तक वह अपने गांव के पास वाले स्कूल में पढ़ी। अब उन्हें आगे पढ़ने के लिए बाहर जाना था, उन्हें यह लग रहा था कि उसकी सुरक्षा से ज्यादा उसकी स्वतंत्रता जरूरी है, उन्हें लग रहा था कि अगर वो स्वतंत्र नहीं हुई तो आगे न जाने पता नहीं कितनी लड़कियों के सपने सुरक्षा की वजह से पूरे नहीं होंगे, और दफन होकर रह जाएंगे।
इसलिए इन्होंने जिद की और बाहर पढ़ने के लिए निकल गई। उनकी स्कूल घर से ढाई किलोमीटर दूर थी। उसके पास साइकिल नहीं थी, पर दिल में जुनून जरूर था। घर से ६ बजे बिना नास्ता लिए वह पढ़ने के लिए निकल जाती। वह गांव की पहली बेटी थी जो आठ के बाद पढ़ने के लिए बाहर जा रही थी, जब वह पढ़ने के लिए जाती तो रास्ते में ६,७ लड़के खड़े रहते, वह लड़कियों की छेड़खानी करते रहेते थे।
जो लड़की वकालत करके लोगों के न्याय के लिए लड़ने वाली थी वह लड़की कैसे अन्याय बर्दाश्त करेगी। तो यह तो स्वाभाविक होना ही था। और सीमा बाकी लड़कियों को यह मैसेज देने वाली थी कि किसी के खिलाफ अगर कोई गलत है तो पहले रिएक्ट करना सीखे, कानून बाद में आता है पहले आपका रिएक्ट आता है। और उन्होंने यह किया।
प्लेटो, एरिस्टोटल, रानी लक्ष्मीबाई, सावित्री बाई जैसे महान आत्मा उसके प्रेरणा स्त्रोत थे। वह एसी महान हस्तियों को पढ़ रही थी और जब वह बाहर निकलती ओर कुछ लड़के इन्हें छेड़ते तो वह कैसे चुप रहती? यह रोज का हो गया था। एक दिन इन्हें गुस्सा आया और उन्होंने इस लड़के को सबक सिखाना तय कर लिया, एक दिन उन लडको को खूब पीटा। और उसके बाद किसी लड़के ने उसके सामने देखने की कोशिश नहीं की। उसके बाद उन्होंने एक नहीं लेकिन अपने २०, २५ लड़कों को पीटा होगा।
इसके बाद इन्हें परिवार से एक पुरानी साइकिल दिलाई गई। वह साइकिल जिसकी चेन ना जाने कितनी बार उतर जाती। उसे संभालते हुए स्कूल पहुंचती थी। वहा अच्छे घरों की लड़कियों को देखते हुए इन्हें वह होता कि मेरे पास उन लड़कियों के जैसी सुख सुविधाए नहीं है लेकिन मेरे पास अच्छे विचार है। अच्छी शिक्षा है। १२वीं कक्षा तक तो वह पास हो गई। तब उनके पिताजी की तबीयत खराब होने लगी थी।
समस्या यह थी की पढ़ाई के लिए पैसे कहां से लाए। लेकिन सीमा बहुत जिद्दी थी वह मर सकती थी, अपने आप को असुरक्षित कर सकती थी लेकिन अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ सकती थी। उनकी बुआ ने उनके लिए सिल्वर की पायल और सोने की कान में पहनने के लिए बालिया बनाई थी। ग्रेजुएशन में एडमिशन के लिए सीमाके पास पैसे नहीं थे। उनके पिता की तबीयत भी ठीक नहीं रहेती थी। इसलिए उन्होंने वह बेच दिया। ओर आगे की पढ़ाई चालु रखी। उन्हें ३५ किलोमीटर दूर पढ़ने जाना था।
वो अपने छोटे से घर में, छोटे कमरों में सपने दिखती थी। और उसने तय कर लिया था की अपने देश, समाज के लिए वो कुछ बड़ा करेगी। अगर उसकी पढ़ाई वहां रुक जाती तो सीमा वही खत्म हो जाती। इसलिए उन्होंने अपने सपने पूरे करने के लिए अपने गहने बेच दिए और सीमा का मानना है कि, एक औरत की पहचान अपने गहनों से ज्यादा अपनी शिक्षा और अपनी जागरूकता से जुड़ी हुई होती है।
वह साइकिल से ढाई किलोमीटर जाती थी। पढ़ाई का जुनून जो था इसलिए कभी कभी सुबह ५.३० बजे निकल जाती थी। उसके बाद एक बस पकड़के डेढ़ २ किलोमीटर जाती। उसके बाद और एक बस पकड़ती वह उन्हें २५ किलोमीटर ले जाती थी। कभी-कभी तो ऐसा भी हो जाता था की सीमा को पूरा पूरा दिन भूखा रहना पड़ता था।
गांधीजी, सरदार पटेल, जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री जैसे महान पुरुषो के पुस्तके प ढ के सीमा को वकील बनने की प्रेरणा मिली। वह जब एसे बड़े-बड़े लोगों के विचारो को पढ़ती थी तो उन्हें ऐसा लगता था कि क्या यह विचार में ऐसे ही पढ़ती रहूंगी की कोई मेरे विचार भी पढेगा। यह विचार सीमा को आगे बढ़ने के लिए उत्साहित कर रही थी।
२००२ में सीमा के पिताजी की मृत्यु हुई। उसका एक मानसिक और भावनात्मक सपोर्ट था वह उनसे अब छिन चुका था। अब इन्हें अकेले ही आगे बढ़ना था। उनके पिताजी की कार्यशैली उसे प्रोत्साहित कर रही थी। जब वह ५ साल की थी तब उसने अपने गांव में बिजली और घरों में पानी आते देखा था। यह सब उनके पिताजी ने गांव में करवाया था। वह एक समाजसेवक थे। जहा लड़कियों को पढ़ने की मंजूरी नहीं थी। वहा सीमा आठ के बाद आगे पढ़ी और जब वह वकालत करना चाहती थी तब मा "कहती थी बहुत बोलती हो", भैया कहते थे, "कम बोला करो क्या वकालत करोगे" और सीमाने सच में वकालत ही कर दिया। और वकालत के जरिए उन्होंने सोचा वो बहुत अच्छा काम करेगी।
एलएलबी में एडमिशन लेने के लिए चुपके से वह अपने दोस्त के घर गई और उनसे पैसे मांगे उनके पास पुस्तक नहीं थी इन्हें आदत थी हर चीज को खोजने की। इटावा जिले के जितने भी बुक स्टोर थे सारे बुक स्टोर में इन्होंने बुक को खोज और यह बुक को हासिल किया। उनके वहा लाइट चली जाती थी। तो जो केरोसिन की डिब्बी होती है उसकी छोटी सी लाइट में उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। इतना होसला बुलंद था कि एलएलबी एंट्रेंस एग्जाम में उसका दूसरा नंबर आया।
उसके बाद उन्होंने सोचा कि अब वह जो करना चाहती थी वह निश्चित रूप से हासिल कर पाएगी, क्योंकि वह गांधीजी से, मोतीलाल नेहरू जी से, नेहरू जी से जितने लीडर थे जिन्होंने एलएलबी किया था उन सबसे बहुत प्रोत्साहित हुई थी।
जब वह एलएलबी में एडमिशन लेने जा रही थी तो तब वह पहली बार ट्रेन में बैठी। कानपुर विश्वविद्यालय में एलएलबी डिग्री के लिए बहुत खुश थी। २००६ में वह एक रजिस्टर एडवोकेट बनी।
१६-१२-२०१२ वो अपने pg मे बहोत सारी लड़कियों के साथ थी। सुबह का समय था। १७ तारीख सुबह पता चला एक बेटी के साथ हमारे देश की राजधानी दिल्ली मे जिस तरीके से एक घटना को अंजाम दिया गया। उस घटना ने उसे बहुत प्रभावित किया। वह १७-१२ की सुबह रोज की तरह अखबार पढ़ने लगे। तब एक न्यूज़ पढ़ा तो पता चला ओर वो सोचने लगी कि इतनी दरिंदगी कोई किसी बेटी के साथ कैसे कर सकता है?
तब उन्होंने वकालत शुरू नहीं की थी। क्योंकि इस दौरान वह आई एस की और जज बनने की तैयारी कर रही थी। लेकिन वो बीच-बीच में प्रैक्टिस के लिए कोर्ट में सीखने चली जाती थी। उस दिन से उसकी जिंदगी ने बहुत बड़ा मोड़ लिया, और उसने यह तय कर लिया कि अगर वह आई एस बन भी गई तो भी कितनी बेटियों को न्याय दिलाएगी।
उसे सरकार के अंदर काम करने का सोच लिया। वह अपनी वकालत की जो शक्ति थी उससे अपने दम पर काम करके इस बेटी के लिए लड़ाई लड़ने का सोचा।
वह निर्भया के माता-पिता को नहीं मिली, पर उसने तय कर लिया था कि अपने वकालत का सही इस्तेमाल करके अपनी इस बहन को न्याय दिलाएगी। उनके pg से लड़कियां जाने लगी थी। क्योंकि उनके माता-पिता यह निर्भया की घटना के बाद डरने लगे थे। वह अपनी बेटियों को घर बुला रहे थे। वह कह रहे थे कि, "जब तुम ही नहीं रहोगी तो आई एस बनकर क्या फायदा? आई एस बनने के लिए भी तुमको सुरक्षित तो रहना पड़ेगा। जब तुम सुरक्षित रहोगी तब तो आई एस बनोगी? सीमा भी अंदर से तो कांपती थी।
एक तो हमारे देश मे बेटियों को इतनी स्वतंत्रता नहीं है जितनी अपने देश के बेटों को है। लेकिन जितनी स्वतंत्रता दी है, मौका दिया है सुरक्षा के कारण उनसे भी छीन लिया जाएगा तो कैसे हम लोग शासन, सत्ता और इस देश की इकोनॉमिक्स, इस देश की समृद्धि में भागीदारी सुनिश्चित करेंगे? यह लड़ाई सिर्फ निर्भया के न्याय की नहीं थी उन देश की ३९ पर्सेंट आबादी की आवाज बनूंगी ऐसा उन्होंने सोचा। उन्हें नहीं पता था कि वह कैसे ए केस लड़ेगी। लेकिन अंदर से तय कर लिया था।
राजपथ पर बहोत सेवक थे। इंडिया गेट के पास वो बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती रही। पिटाई भी हुई। पुल पर चढ़कर उन्होंने अपने आप को बचाया। उसने निर्भया के आरोपियों को फांसी दिलाने के लिए हो रहे दिखावे ओर आंदोलनों मे भाग ले रही थी। सूत्रोच्चार किया ओर पोलिस की लाठियां भी खाई।
उसके बाद वो पहली बार निर्भया के माता-पिता को मिलने गई उसके घर वहां उन्होंने रिक्वेस्ट कि मुझे एक बार अपनी बेटी निर्भया की फोटो दिखा दे। करीब १० मिनट तक वह निर्भया को फोटो में देखती रही और उसको पूछती रही कि आखिर तुम्हारा गुनाह क्या था, और उस दिन निर्भया के फोटो से सीमा प्रतिज्ञा करके आई की निर्भया में तुम्हें न्याय दिलाऊंगी।
यह लड़ाई आसान नहीं थी। जैसे कि हम सभी लोग जानते हैं दस, पंद्रह या बीस साल केस चलते हैं। पेंटिंग रहते हैं। सीमा लड़ती रही। इतना आसान नहीं था। देश में पहली बार चार लोगों को फांसी की सजा दिलानी। जो कि लोगों के लिए वह नामुमकिन था, लेकिन यह जिद्दी लड़की सीमा जिसके गांव में लड़कियों को पढ़ने की परमिशन नहीं थी। घर से निकलने की परमिशन नहीं थी। फिर भी वो पढ़ी ओर वकील बनी। वह जिद उसकी यहां पर भी थी कि हम करेंगे और उन्होंने करके दिखाया।
२० मार्च २०२० का वह दिन था। जिस दिन उन चार लोगों को देश की अंदर पहली बार फांसी दी गई।
आखिर सात वर्ष की लंबी कानूनी लड़त के बाद सीमा निर्भया केसके हेवानो को फांसी दिलवा कर न्याय दिलाने मे सफल रही।
आज भी यह सीमा कहेती है कि यह निर्भया का न्याय नहीं है। यह उन अपराधियों की सजा थी। जिन्होंने यह दरिंदगी निर्भया के साथ की। निर्भया के साथ न्याय तो तब होता जब वह आज हमारे बीच जिंदा होती। और हमारे देश में निरंतर बेटियों के साथ अपराध हो रहा है। सीमा का कहेना है की बेटिया कैसे सुरक्षित हो, उसे पर काम करना चाहिए। ओर सीमा ने काम करना शुरू कर दिया।
निर्भया केस उसकी जिंदगी का पहला केस था। लेकिन यह आखिरी नहीं था लेकिन सीमा उस तरीके के केस को आखिरी बनाना चाहती है, क्योंकि वह चाहती है चाहे वह बेटी अपने घर की हो, हमारे घर की हो, या किसी की भी बेटी हो उसके साथ ए दरिंदगी नहीं होनी चाहिए।
उस देश की उन पचास परसेंट आबादी का अगर मेरा देश सही तरीके से इस्तेमाल कर लेगा, उसको सुरक्षित करके तो शायद यह देश वाकय में समृद्ध बनेगा, और एक वो मेसेज देना चाहती है पूरे देशवासियों को कि अपनी बेटियों को इनोसेंट मत बनाइए, उनको नॉलेजेबल बनाइए।
उनको टॉकटीव बनाइए। अगर वो बेटियां इनोसेंट होगी तो वो कैसे अपनी बात लोगों के बीच कह सकेगी। जिस बेटी को आप घर में इनोसेंट बेटी के रूप में देखना चाहेंगे जब वो इस घर की चार दीवारों से बाहर निकलेगी। तो अपने हक, अधिकार की लड़ाई कैसे लड़ेगी।
जिस बेटी को अपने घर में नहीं बोलने दिया वो कैसे अपने आप को सुरक्षित करेगी। कैसे उन लोगों से प्रोटेक्ट करेगी जो उसको गलत निगाह से देख रहे हैं। जो उसको सिर्फ एक ऑब्जेक्ट समझ रहे हैं, तो ए लड़ाई घर में बेटियों को लड़ना सिखाना है।
इस केस की सफलता के लिए उन्हें आत्म संतोष हुआ। और आशा का नया दीपक जलाया। अब उसे अपने जीवन का उद्देश स्प ष्ट दिखाई देता था। उसने उसका समग्र जीवन गरीबों, शोषितों ओर अन्याय से पी डी तो की सेवा में समर्पित कर दिया।
वो आज भी स्त्री सम्मान ओर गौरव के लिए लड़ रही है ओर हमेशा लड़ती रहेगी। सीमा कुशवाहा की संघर्ष गाथा हर व्यक्ति के लिए प्रेरणा रूप है। उसने विपरीत परिस्थितियों के बीच भी अपने सपनो के दीपक को प्रज्वलित रखा है। और उसके तेज से लोगो के जीवन में उजाला फैलाया है।
*तरलिका प्रजापति "तत्त्वमसि"*
