लोकेशन नेशनल एंकर अधिवक्ताओं के कल्याण की अनदेखी: एक विचारणीय मुद्दा
अधिवक्ता राजेश कुमार की लिखनी कलम se
नमस्कार, मैं अधिवक्ता राजेश कुमार, नेशनल ब्यूरो हेड लीगल एडवाइजर के रूप में, आज की TTN24 नेशनल न्यूज़ चैनल की ओर से एक महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा कर रहा हूं। भारत की आजादी को 78 वर्ष बीत चुके हैं। इस में अनगिनत प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, लोकसभा और राज्यसभा सांसद, तथा उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति आए और गए। इनमें से कई स्वयं अधिवक्ता पृष्ठभूमि से थे, लेकिन अफसोस की बात है कि इनमें से किसी ने भी अधिवक्ता समुदाय के हितों पर गंभीरता से विचार नहीं किया। अधिवक्ता वह व्यक्ति है जो न्याय की रक्षा करता है, चाहे वह साधारण नागरिक हो या उच्च पदाधिकारी। वह अपना जीवन न्याय प्रदान करने में समर्पित कर देता है, लेकिन स्वयं उसके जीवन में क्या सुविधाएं हैं? सरकार की ओर से कोई चिकित्सा लाभ, कोई पेंशन योजना, या कोई वित्तीय सहायता नहीं मिलती। यदि अधिवक्ता बीमार पड़ जाए तो इलाज के लिए पैसे कहां से आएंगे? क्या अधिवक्ताओं को यूं ही संघर्ष करते रहना पड़ेगा?अधिवक्ताओं की भूमिका और उनकी चुनौतियां
अधिवक्ता भारतीय न्याय व्यवस्था की रीढ़ हैं। वे आम जनता से लेकर मंत्रियों और प्रधानमंत्रियों तक सभी को न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन उनके स्वयं के जीवन को देखें तो यह विचित्र है। कोई सरकारी नौकरी की तरह मेडिकल इंश्योरेंस नहीं, कोई पेंशन नहीं, और कोई नियमित आय की गारंटी नहीं। कई अधिवक्ता, विशेषकर नए और ग्रामीण क्षेत्रों में, आर्थिक संघर्ष से गुजरते हैं। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अनुसार, जूनियर अधिवक्ताओं के लिए न्यूनतम स्टाइपेंड की सिफारिश की गई है – शहरी क्षेत्रों में 20,000 रुपये और ग्रामीण क्षेत्रों में 15,000 रुपये प्रति माह लेकिन यह केवल सिफारिश है, अनिवार्य नहीं। क्या इतने से अधिवक्ता का परिवार चल सकता है?
योजनाएं: राज्य स्तर पर प्रयास, लेकिन केंद्रीय स्तर पर कमी
हालांकि कुछ राज्य सरकारों ने अधिवक्ताओं के कल्याण के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन ये पर्याप्त नहीं हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली सरकार की चीफ मिनिस्टर एडवोकेट्स वेलफेयर स्कीम (CMAWS) अधिवक्ताओं को वित्तीय सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा और पेशेवर विकास प्रदान करती है इस योजना के तहत 10 लाख रुपये का जीवन बीमा, 5 लाख रुपये का मेडिकल कवर, और परिवार के लिए फ्लोटर कवर उपलब्ध है इसी प्रकार, आंध्र प्रदेश में मृत्यु लाभ के रूप में 4 लाख रुपये, अंतिम संस्कार के लिए 10,000 रुपये, और चिकित्सा सहायता के लिए 50,000 रुपये तक की मदद दी जाती है मध्य प्रदेश में अधिवक्ता कल्याण योजना 1982, 1989, और परिवार कल्याण योजना जैसी स्कीम्स हैं जो विकलांग अधिवक्ताओं और मृत अधिवक्ताओं के परिवारों को सहायता प्रदान करती हैं
केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में जूनियर अधिवक्ताओं के लिए स्टाइपेंड या वित्तीय सहायता की योजनाएं हैं तमिलनाडु में एडवोकेट वेलफेयर फंड स्वास्थ्य संकट में वित्तीय सहायता प्रदान करता है बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी गंभीर बीमारी से पीड़ित निर्धन अधिवक्ताओं के लिए वित्तीय सहायता योजना बनाई है लेकिन ये सभी मुख्य रूप से राज्य स्तर की हैं। केंद्रीय बजट में अधिवक्ताओं के लिए कोई विशिष्ट आवंटन नहीं होता। क्या यह न्यायसंगत है कि जो न्याय दिलाते हैं, उनके लिए कोई केंद्रीय सुरक्षा जाल नहीं?
क्यों आवश्यक है अधिक ध्यान?
अधिवक्ता कई बार राजनीति में प्रवेश करते हैं और उच्च पदों पर पहुंचते हैं, लेकिन सत्ता मिलते ही वे अपने समुदाय को भूल जाते हैं। गाड़ी, पद और सुविधाएं मिलते ही प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। लेकिन याद रखें, पद क्षणिक हैं। कल जब पद चला जाएगा, तब भी अधिवक्ता की आवश्यकता रहेगी। सरकार को चाहिए कि केंद्रीय स्तर पर एक व्यापक योजना लाए, जिसमें मेडिकल इंश्योरेंस, पेंशन, और नए अधिवक्ताओं के लिए स्टाइपेंड शामिल हो। बार काउंसिल की सिफारिशों को अनिवार्य बनाया जाए।
अंत में, मैं अपील करता हूं कि अधिवक्ताओं के योगदान को मान्यता दी जाए। वे न्याय के प्रहरी हैं, और उनके कल्याण पर ध्यान देना देश के न्यायिक ढांचे को मजबूत करेगा। यदि हम चाहते हैं कि न्याय सबको समान रूप से मिले, तो न्याय दिलाने वालों का भी ख्याल रखना होगा।
अधिवक्ता राजेश कुमार
नेशनल ब्यूरो हेड लीगल एडवाइजर। टीटीएन 24 नेशनल न्यूज़ चैनल
