लोकेशन नेशनल भारत में एकता की पुकार: नफरत की राजनीति से ऊपर उठकर विकास का सपना साकार करें
लेखक: अधिवक्ता राजेश कुमार (नेशनल ब्यूरो हेड एवं लीगल एडवाइजर)
भारत, वह देश जहां विविधता हमारी सबसे बड़ी ताकत रही है, आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां नफरत की आग ने समाज की जड़ों को झुलसाना शुरू कर दिया है। 140 करोड़ से अधिक आबादी वाला यह राष्ट्र, जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और हर जाति-धर्म के लोग सदियों से साथ रहते आए हैं, अब राजनीतिक लाभ के लिए विभाजन की शिकार हो रहा है। सवाल यह है कि हम कब तक इस आग में जलते रहेंगे? कब तक सत्ताधारी नेता धर्म, जाति और समुदाय के नाम पर हमें बांटकर अपनी सत्ता की रोटियां सेंकते रहेंगे? एक आम नागरिक के रूप में, पटना, बिहार से आने वाले अधिवक्ता के तौर पर, मैंने गहन चिंतन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि हमें अपनी पहचान को धर्म या जाति से ऊपर उठाकर सिर्फ 'भारतीय' बनना होगा। यह लेख उसी सोच पर आधारित है, जहां हम शांति, सद्भाव और विकास की बात करेंगे, न कि नफरत की।नफरत की राजनीति: 2014 के बाद का बदलाव
2014 के बाद से भारत की राजनीतिक परिदृश्य में एक स्पष्ट बदलाव आया है। जहां पहले विकास, रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दों पर चुनाव लड़े जाते थे, वहीं अब हिंदू-मुस्लिम विभाजन, धार्मिक उन्माद और जातिगत राजनीति ने मुख्य स्थान ले लिया है। सत्ताधारी दल के कई नेता, यहां तक कि मुख्यमंत्री स्तर के पदाधिकारी, ऐसे बयान देते हैं जो नफरत को बढ़ावा देते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ राज्यों में 'लव जिहाद' या 'घर वापसी' जैसे अभियान चलाए जाते हैं, जो समाज में दरार पैदा करते हैं। क्या यह संयोग है कि ऐसे मुद्दों पर चुनावी रैलियां सजती हैं और वोट बैंक मजबूत होता है? नहीं, यह एक सोची-समझी रणनीति है, जहां लोगों की भावनाओं को भड़काकर सत्ता हासिल की जाती है।
लेकिन सवाल यह है: क्या ऐसी स्थिति में देश का विकास संभव है? जब प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक नफरत की भाषा बोलेंगे, तो समाज में शांति कैसे कायम रहेगी? इतिहास गवाह है कि विभाजित समाज कभी आगे नहीं बढ़ता। जर्मनी का नाजी दौर हो या रवांडा का नरसंहार, नफरत की राजनीति ने हमेशा विनाश ही लाया है। भारत में भी, अगर हम देखें तो 2020 के दिल्ली दंगे या हाल के जातिगत संघर्षों ने अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान पहुंचाया है। निवेशक शांति चाहते हैं, न कि अस्थिरता। विश्व बैंक और आईएमएफ की रिपोर्ट्स बताती हैं कि सामाजिक सद्भाव वाले देशों में जीडीपी ग्रोथ 2-3% अधिक होती है। लेकिन यहां, नफरत की आग में जलकर हम अपना ही घर जला रहे हैं।
हमारी पहचान: भारतीय, न कि हिंदू-मुस्लिम या जाट
हम सभी इस देश के नागरिक हैं – हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जाट, दलित, आदिवासी – लेकिन हमारी असली पहचान 'भारत' होनी चाहिए। संविधान की प्रस्तावना में 'हम भारत के लोग' लिखा है, न कि किसी धर्म या जाति का नाम। महात्मा गांधी ने कहा था, "भारत की आत्मा गांवों में बसती है," लेकिन आज की राजनीति ने उस आत्मा को घायल कर दिया है। हमें याद रखना चाहिए कि स्वतंत्रता संग्राम में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने फांसी के फंदे पर हंसते हुए चढ़कर देश के लिए कुर्बानी दी, न कि किसी धर्म के लिए। वीर शिवाजी, राणा प्रताप, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, वीर कुंवर सिंह – ये सभी योद्धा थे जो अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़े, बिना जाति-धर्म की परवाह किए।
नेहरू और पटेल ने आजादी के बाद एक मजबूत भारत की नींव रखी, जहां लाल बहादुर शास्त्री ने 'जय जवान, जय किसान' का नारा देकर एकता की मिसाल दी। लेकिन आज, कुछ नेता इन महान व्यक्तियों के नाम पर ही राजनीति करते हैं, जबकि उनकी विरासत को भूल जाते हैं। लाला लाजपत राय जैसे स्वतंत्रता सेनानी ने साइमन कमीशन के खिलाफ लाठी खाई, ताकि हम आजाद भारत में रह सकें। क्या हम उनकी कुर्बानी को नफरत की राजनीति से अपमानित करेंगे?
विकास के लिए शांति अनिवार्य
देश का विकास तभी संभव है जब शांति हो। नफरत की राजनीति से अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है – दंगे, हड़तालें, सामाजिक अशांति से निवेश रुकता है, पर्यटन घटता है, और युवा बेरोजगार रह जाते हैं। 2026 तक भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य है, लेकिन अगर हिंदू-मुस्लिम विभाजन जारी रहा, तो यह सपना दूर की कौड़ी साबित होगा। हमें जरूरत है ऐसे नेताओं की जो विकास की बात करें, न कि विभाजन की। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार – ये मुद्दे होने चाहिए मुख्यधारा में।
सच्चे देशभक्त होने के लिए किसी प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं। बस, उन जहरीले राजनेताओं से दूर रहें जो धर्म या जाति के नाम पर हमें बांटते हैं। वे 'दरिंदे' और 'नीच मानसिकता' वाले लोग हैं जो अपनी सत्ता के लिए समाज को तोड़ते हैं। हमें एकजुट होकर इनसे लड़ना होगा – वोट से, आवाज से, और कानूनी तरीके से।
आगे का रास्ता: एक सच्चे भारत का निर्माण
आइए, हम भारत के लोग सामने आएं और उस सपने को साकार करें जो हमारे पूर्वजों ने देखा था। गांधी, नेहरू, पटेल, भगत सिंह – इनकी विरासत को जीवित रखें। युवाओं को शिक्षित करें, महिलाओं को सशक्त बनाएं, और हर नागरिक को समान अवसर दें। सामाजिक सद्भाव के लिए कानून सख्त हों, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है हमारी मानसिकता। स्कूलों में एकता की शिक्षा दें, मीडिया में सकारात्मक खबरें फैलाएं, और सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वालों को ब्लॉक करें।
अंत में, याद रखें: भारत तभी मजबूत होगा जब हम एक हों। नफरत की आग बुझाएं, विकास की ज्योति जलाएं। यह समय है उठने का, बोलने का, और बदलाव लाने का। जय हिंद!
यह लेख अधिवक्ता राजेश कुमार द्वारा लिखित है, जो झारखंड बिहार बोकारो से हैं और सामाजिक सद्भाव एवं कानूनी मुद्दों पर कार्यरत हैं। यह विचार व्यक्तिगत हैं और देश की एकता को मजबूत करने के उद्देश्य से लिखे गए हैं।)
