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अरवल्ली गुजरात: भवनाथ, जूनागढ़ में अलख नाद: भिक्षुओं की धूप और भस्म के पीछे का रहस्य, जानिए आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व

 ब्यूरो रिपोर्ट भरतसिंह आर ठाकोर अरवल्ली गुजरात 9638076908


*भवनाथ, जूनागढ़ में अलख नाद: भिक्षुओं की धूप और भस्म के पीछे का रहस्य, जानिए आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व*

जूनागढ़ के भवनाथ में महाशिवरात्रि मेला शुरू होते ही चारों ओर 'हर हर महादेव' और 'अलख निरंजन' की ध्वनि गूंजने लगती है। हजारों साधु-संतों ने गिरनार की तलहटी में डेरा डाला हुआ है, जहां आकर्षण और आस्था का केंद्र भिक्षुओं का 'धूना' और उनके शरीर पर सजने वाली 'भस्म' है।


*धुएँ भरी दुनिया के जुनून को जलाने का प्रतीक*


भिक्षुओं के लिए धूना सिर्फ अग्नि का कुंड नहीं, बल्कि भगवान शिव का साक्षात रूप और उनका मंदिर है। साधु धोना के चारों ओर बैठकर मंत्र जाप और घोर साधना करते हैं। राख को काम, क्रोध और लोभ जैसे मानवीय विकारों को आग में जलाकर आत्मा को शुद्ध करने का प्रतीक माना जाता है।


*हांफना*


साधु-संत अपने शरीर पर जो भस्म (भभूत) लगाते हैं उसके पीछे एक गहरा रहस्य छिपा है। दाह संस्कार उस परम सत्य की याद दिलाता है कि यह नश्वर शरीर एक दिन राख में मिल जाएगा। यह मनुष्य के अहंकार को पिघलाकर उसे नम्र बना देता है। शिव का रूप धारण करके साधु अपने आराध्य के साथ एकाकार हो जाते हैं।


वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार भस्म शरीर के छिद्रों को बंद कर देती है, जिससे अत्यधिक ठंड या असहनीय गर्मी का शरीर पर नगण्य प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा यह त्वचा संबंधी रोगों से बचाता है और नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखता है।

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