*बांदे: बांग्लादेशी शरणार्थियों और घुसपैठियों द्वारा आदिवासियों पर अत्याचार का आरोप महामहिम राज्यपाल छत्तीसगढ़ शासन को सौंपा ज्ञापन।*
*रिपोर्टर -उत्तम बनिक पखांजूर*
क्षेत्रीय आदिवासी समाज के द्वारा आज नायब तहसीलदार बांदे के माध्यम से महामहिम राज्यपाल छत्तीसगढ़ शासन कोपखांजुर तहसील के परलकोट क्षेत्र में बांग्लादेशी शरणार्थियों और अवैध घुसपैठियों द्वारा स्थानीय आदिवासियों पर लगातार अत्याचारों का आरोप लगाया गया है। आदिवासियों ने इन घटनाओं के लिए पुलिस और वन विभाग के अधिकारियों पर बांग्लादेशियों के साथ मिलीभगत का भी आरोप लगाया है।
स्थानीय आदिवासियों ने महामहिम राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपकर शिकायत पत्र में आरोप लगाया है कि 1970 के दशक में अस्थाई रूप से बसाए गए बांग्लादेशी शरणार्थी और बाद में अवैध रूप से आए बांग्लादेशी घुसपैठिए मिलकर यहां के मूलनिवासी आदिवासियों पर अत्याचार कर रहे हैं। इन अत्याचारों में चोरी, लूटपाट, मारपीट, महिलाओं के साथ बलात्कार, जमीन हड़पना और सरकारी योजनाओं का दुरुपयोग करना शामिल है।
शिकायत में कहा गया है कि जब भी पीड़ित आदिवासी बांदे थाने में शिकायत दर्ज कराने जाते हैं, तो पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर देते हैं। आरोपों के मुताबिक, पुलिस अधिकारी पीड़ितों को धमकाते हैं और लिखित शिकायत की रसीद भी नहीं देते हैं।
पुलिस अधिकारियों पर मिलीभगत का आरोप शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि बांदे थाने के प्रभारी मनीष नेताम ने 21 अगस्त 2025 को एक आदिवासी के साथ हुई मारपीट और जातिगत गाली-गलौज की शिकायत को दबाने की कोशिश की है, आरोप है कि उन्होंने शिकायतकर्ता से बीस से तीस हजार रुपए की मांग की और जबरन समझौता करवाकर हस्ताक्षर करवाए।
अवैध रेत खनन: तिरलगढ़ गांव के आदिवासियों ने 12 जून 2025 को बांदे थाने में बांग्लादेशी शरणार्थियों द्वारा बिना अनुमति के अवैध रूप से रेत चोरी करने की शिकायत की थी, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
ठगी और लूटपाट: कन्हारगांव के एक आदिवासी ने बांदे थाने में एक बांग्लादेशी शरणार्थी द्वारा ₹1,20,000 की ठगी की शिकायत की थी, लेकिन इस मामले में भी कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई।
वन भूमि पर अतिक्रमण: शिकायत के अनुसार, परलकोट क्षेत्र के बांग्लादेशी शरणार्थियों ने जंगल की जमीन पर अतिक्रमण कर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की है। 12 जून 2025 को वन विभाग को इसकी जानकारी दी गई थी, लेकिन अतिक्रमणकारियों पर कार्रवाई करने के बजाय विभाग ने उन्हें उसी जमीन पर धान की रोपाई करने की अनुमति दी है।
शिकायतकर्ताओं ने मुख्यमंत्री और अन्य उच्च अधिकारियों से इस मामले की तत्काल जांच कराने और दोषी पुलिस तथा वन विभाग के अधिकारियों को निलंबित करने की मांग की है। उनका कहना है कि इन अधिकारियों के कारण क्षेत्र के आदिवासी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।