ब्यूरो रिपोर्ट भरतसिंह आर ठाकोर अरवल्ली गुजरात 9638076908
*छारी-ढंढ वेटलैंड में आने वाला यह प्रवासी पक्षी दुनियाभर के पक्षीप्रेमियों को करता है आकर्षित*
*दुनियाभर के अनेक पर्यटक केवल ‘ग्रे हाइपोकोलियस’ पक्षी को देखने के लिए ही आते हैं छारी-ढंढ*
*मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन में राज्य में आर्द्रभूमि क्षेत्रों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए*
*कच्छ के छारी-ढंढ वेटलैंड में पक्षियों की विविधता; विशेषकर ग्रे हाइपोकोलियस तथा व्हाइट-नेप्ड टिट को देखने के लिए 52 से अधिक देशों के (विदेशी) पर्यटक नियमित रूप से आते हैं*
*गांधीनगर, 10 फरवरी :* कच्छ जिले के छारी-ढंढ कंजर्वेशन रिजर्व को हाल ही में रामसर साइट का दर्जा मिला है। इस आर्द्रभूमि के आसपास 283 से अधिक प्रजाति के पक्षी दर्ज हुए हैं, परंतु यहाँ देखे जाने वाले दुर्लभ एवं प्रवासी पक्षी दुनियाभर के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। इन पक्षियों में ग्रे हाइपोकोलियस मुख्य आकर्षण का केन्द्र है। गुजराती में इसे ‘मस्कती लटोरो’ कहते हैं।ग्रे हाइपोकोलियस (Hypocolius ampelinus) सबसे विशिष्ट तथा आकर्षक पक्षी है। पतली काया वाला यह पक्षी इराक, ईरान, अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान के शुष्क क्षेत्रों में प्रजनन करता है और 1990 से कच्छ के छारी-ढंढ के आर्द्रभूमि क्षेत्र में शीत ऋतु बिताने आता है।
विशेषज्ञों के अनुसार ग्रे हाइपोकोलियस सामान्यतः शुष्क झाड़ीदार क्षेत्रों, मरु (रण) प्रदेशों एवं निकटस्थ कृषि क्षेत्रों में देखने को मिलते हैं। वे ज्यादातर छोटे समूहों में देखे जाते हैं तथा फलदार पेड़ तथा झाड़ियों के फल-बेर उनका आहार होते हैं। विशेषकर; इस पक्षी को पिलुडी (Salvadora oleoides/persica) के फल ‘पीलु’ अति प्रिय हैं। शीत ऋतु के महीनों में दुनियाभर के पक्षीप्रेमी तथा शोधकर्ता इस दुर्लभ प्रवासी पक्षी को देखने के लिए छारी-ढंढ जरूर आते हैं।
पक्षी निरीक्षक कहते हैं कि ग्रे हाइपोकोलियस अक्टूबर-नवंबर के दौरान फुलाय गाँव के झाड़ी वाले जंगलों में आते हैं और मार्च या अप्रैल तक यहाँ रहते हैं। यह पक्षी मुख्यतः Salvadora persica के पके हुए बेर (स्थानीय रूप से ‘पिलुडी’ या ‘खारी जार’) पर निर्भर रहता है। इसके अतिरिक्त; यह ‘टांकरा’ नाम से जाने जाने वाले पौधे के फूल के बेर भी खाता है।एक रिसर्च के अनुसार 22 और 23 मार्च, 1960 को कच्छ के बड़े रण में कुआर बेट (टापू) से ग्रे हाइपोकोलियस के दो सैम्पल एकत्र किए गए थे। इसके बाद 23 जनवरी, 1990 को पक्षीविद् श्री एस. एन. वरु ने बन्नी के घास वाले मैदानों में स्थित फुलाय गाँव में एक मादा ग्रे हाइपोकोलियस को देखा था। उनके इस निरीक्षण को एक महत्वपूर्ण पुनर्शोध माना जाता है।
छारी-ढंढ वेटलैंड में ग्रे हाइपोकोलियस को देखने के लिए यह सबसे विश्वसनीय एवं श्रेष्ठ स्थल माना जाता है; जिसके कारण यह स्थल वैश्विक पर्यटकों, पक्षीप्रेमियों तथा वन्यजीव फोटोग्राफरों के लिए मुख्य आकर्षण बन गया है।
इसके अतिरिक्त; व्हाइट-नेप्ड टिट (Machlolophus nuchalis) पक्षी को देखने के लिए भी पर्यटक आते हैं। यह पक्षी दुनियाभर में केवल भारत में ही देखने को मिलता है और भारत में सबसे अधिक कच्छ में।

