साधना अंतिम लक्ष्य ही सेवा है जब कृपा की शक्ति देश और राष्ट्र उत्थान में लगती: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज
🙏🙏🌹🌹🙏🙏🌹🌹"सादर जय सियाराम"
गुरुदेव की कृपा से मिली ऊर्जा जब देश और राष्ट्र के काम आएं तभी जीवन की धन्यता हो सकता है तभी अपना जीवन धन्य मानना चाहिए ।
साधना अंतिम लक्ष्य ही सेवा है जब कृपा की शक्ति देश और राष्ट्र उत्थान में लगती है ।
तभी पात्रता पूरी होती है ।
जैसे गंगोत्री से निकली गंगा जी अपने में ठहरती , वैसे ही गुरुदेव की मिला प्रकाश केवल व केवल अपने लिए नहीं होता ।
अपितु जगत मंगल के लिए होता है ।
जो साधना में पाया उसे सेवा में लुटा दो , यही पूर्णता है ।
साधना बिना सेवा अहंकार का नया रूप ले लेता है ।
साधना से पात्रता बनती है , और सेवा से कृपा बरसती है ।
सेवा का तीन स्तर :
1- तन की सेवा : देश , समाज और राष्ट्र के लिए शरीर से श्रम करना ।
2- मन की सेवा : किसी को धैर्य देना , सुनना , प्रेम देना , संगति से ऊपर उठना ।
3- धन की सेवा : अपनी पात्रता से अर्जित साधनों को परहित में लगाना ।
गुरुदेव की कृपा से मिली ऊर्जा जब तक दूसरों के आंसू पोंछने , देश के काम राष्ट्र के काम आने और जीव मात्र को कल्याण में न लगे जब तक साधन अधूरी मानी जायेगी ।
साधना का दीपक खुद जलकर औरों को प्रकाश दें तभी पूर्णाता मानी जायेगी ।
आपका मार्गदर्शक आपके पूज्य गुरुदेव ,
[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]
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