लोकेशन आलोट जिला संवाददाता डॉ सुनील चोपड़ा
सुख आए तो हंस लो और दुख आए तो हंसी में टाल दो
-- राष्ट्र-संत श्री ललितप्रभ जी
आलोट । जो गया उसका रोना रोने की बजाय जो है उसका आनंद लेना सीख जाएं। जिंदगी जीने के दो तरीके हैं या तो जो खोया है, उसका रोना रोओ, या जो बचा है उसका आनंद मनाओ। तय आपको करना है, आप कैसी जिंदगी जीएंगे। जीवन का यह सिद्धांत बना लें कि जो मेरा है वो जाएगा नहीं और जो चला गया वो मेरा था ही नहीं। इस मंत्र को लेकर जो जीवन जीता है, वह जिंदगी में कभी दुखी नहीं होता। सुख आए तो हंस लो, और दुख आए तो हंसी में टाल दो यही जीवन का मूलमंत्र है।यह विचार राष्ट्र संत ललित प्रभ सागर जी ने नगर के जैन पंचायती भवन पर शुक्रवार रात्रि में आयोजित धर्मसभा में जीवन जीने की कला विषय पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अक्सर आदमी के पास जो है, उसका वह आनंद नहीं उठाता और जो नहीं है, उसका रोना रोकर दुखी होता रहता है। आज से अपने जीवन को यह पॉजीटिव मंत्र बना लें कि मैं आज से आह.आह नहीं वाह. वाह करुंगा। जीवन का दूसरा मंत्र यह बना लें कि मैं हमेशा प्रकृति के विधान में विश्वास करुंगा। जीवन के हर पल-हर क्षण को मैं बहुत प्रसन्नता, आनंद से जीऊंगा। जो व्यक्ति जीवन में घटने वाली हर घटना को प्रेम से स्वीकार करता है, उसका जीवन आनंद से भर उठता है।
जिंदगी को हम भुनभुनाते हुए नहीं गुनगुनाते हुए जीएं।
उन्होंने कहा कि आज संकल्प लीजिए कि जीवन आह. आह करके नहीं वाह. वाह कहते जीऊंगा। जब भी हम वाह. कहते हैं तो यही जिंदगी हमारे लिए स्वर्ग बन जाती है और जब हम आह. कहते हैं तो जिंदगी नर्क-सी हो जाती है। अगर हमारे लिए थाली में भोजन आया है तो शुक्रिया अदा करो देने वाले भगवान का, अन्न उपजाने वाले किसान का और घर की भागवान का। जरा कल्पना करें आज से 50 साल पहले लोगों के पास आज जैसा भौतिक सुख भले कम था पर सुकून बहुत था। उस वक्त जब सुकून बहुत था तो आदमी बड़े चैन से सोता था। आज सुख है तो भी लोग पूरी रात चैन से सो नहीं पाते। आज आदमी की जिंदगी कैसी गजब की हो चुकी है, बेडरूम में एसी और दिमाग में हीटर।
उन्होंने कहा कि पत्थर में ही प्रतिमा छिपी होती है, जरूरत केवल उसे हमें तराशने की है। लगन, उमंग, उत्साह हो तो मिट्टी से मंगल कलश, बांस से बांसुरी बन जाती है। यह हमारी जिंदगी परम पिता परमेश्वर का दिया प्रसाद है, हम भी इसका सुंदर निर्माण कर सकते हैं। जीवन के हर क्षण, हर पल को हमें आनंद-उत्साह से भर देना चाहिए, अगर प्रेम, आनंद-उल्लास, माधुर्य से जीना आ जाए तो आदमी मर कर नहीं जीते-जी स्वर्ग को पा सकता है।
इससे पूर्व डॉ मुनि श्री शांति प्रिय सागर जी महाराज ने कहा कि जो दो हाथों से दान देते हैं, विधाता उनकी हजार हाथों से झोलियाँ भरता है। अगर आप रोज देंगे दान तो बहुत जल्दी बन जाएँगे धनवान। दान देने से रुपए कम होते हैं, पर लक्ष्मी की कृपा दुगुनी बरसती है। जैसे धरती में एक बीज बोया जाए तो प्रकृति हजार गुना लौटाती है, वैसे ही दान और कुछ नहीं, समृद्धि पाने का इन्वेस्टमेंट है, जो कई गुना होकर वापस लौट आता है। याद रखें, परोपकार से बढ़कर कोई पुण्य नहीं है और पीड़ा से बढ़कर कोई पाप नहीं। जैसे बिना डॉक्टर का अस्पताल, बिना मूर्ति का मंदिर, बिना ब्रेक की गाड़ी, बिना पैसे का पर्स, बिना पानी की नदी बेकार है। वैसे ही परोपकार बिना जीवन बेकार है। अगर हम यहाँ किसी का अच्छा कर रहे होते हैं तो मान कर चलिए ऊपर वाला हमारे लिए भी अच्छा कर रहा होता है।
उन्होंने कहा कि एक फैक्ट्री में मजदूर काम करता है, जो मेहनत से रोज के 500 रुपये कमाता है, इंजीनियर काम करता है, जो दिमाग से 5000 रुपये कमाता है, पर एक मालिक भी काम काम करता है, जो किस्मत से 5,00,000 रुपये रोज के कमाता है। इस किस्मत को खोलने का सरल रास्ता है दान। दान देने से हमारी बंद पड़ी भाग्य रेखा खुलनी शुरू हो जाती है।
संतश्री ने अमीरों से कहा कि अगर आप अपनी सारी संपत्ति संतानों के लिए छोड़ कर जाएँगे तो आपको दो लोग याद करेंगे, पर आप जनता के लिए कुछ करके चले जाओगे तो आपको हजारों लोग याद करेंगे। जिसके पास ‘भेजा’ होता है, वह कमाना जानता है, पर जिसके पास कलेजा होता है, वही लगाना जानता है। सूरज हमें रोशनी देता है, हम भी तो कुछ देना सीखें। जो कुछ हमें प्रभु से मिला है, उसे बांटकर खाना सीखें। अगर आपके पास दो रोटी है और खाने वाले चार है तो भी मिल बाँटकर खाने का आनंद लीजिए।
राष्ट्र-संत ने कहा कि दूध का सार मलाई है, पर जीवन का सार भलाई है। हाथ से फेंका गया पत्थर 100 फीट दूर जाता है, बंदूक से दागी गई गोली 500 फीट दूर जाती है, तोप से छोड़ा गया गोला 5000 फीट दूर जाता है, पर गरीब को खिलाई रोटी ठेठ स्वर्गलोक तक जाती है। अगर हम औरों का भला करेंगे तो हमारा लाभ अपने आप बढ़ता जाएगा। हमें शुभ लाभ के साथ-साथ शुभ खर्च भी करना चाहिए।
धर्मसभा में सैकड़ों श्रद्धालु विशेष रूप से उपस्थित थे। राष्ट्रसंतों के 8 फरवरी को सीतामऊ में प्रवचन सत्संग आयोजित होंगे, जिसमें आलोट के अनेक श्रद्धालु भाग लेंगे।
धर्म सभा का आयोजन खरतर गच्छ संघ आलोट द्वारा किया गया था, इस दौरान संघ के अध्यक्ष सुरेश बांठिया उपाध्यक्ष राजेंद्र पारीख एवं सकल श्री संघ एवं अन्य प्रमुख समाज के प्रबुद्ध जन उपस्थित थे, आभार सुनील चोपड़ा ने माना ।
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